खलारी में बच्चों के शरीर पर जमने लगी है धूल

झरिया की आग को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय त्रासदी घोषित किया है। लेकिन रांची से 63 किमी दूर खलारी के धूल और आग का क्या? हालत यह है कि बच्चों के चमड़े काले पड़ चुके हैं। धूल इतनी की एक दूसरे का चेहरा देखना भी मुश्किल। इस वक्त कुल चार साइट (डकरा, केडी ओल्ड, आरसीएम और केडीएस) में कोयला गिरता है। यह पिपरवार और डकरा कोलियरी से डंपर के माध्यम से आता है। इलाके में पानी छिड़काव के लिए नौ महीना पहले 25 से अधिक स्प्रिंकलर लगाए गए हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि केवल पानी छिड़काव के लिए दिन में दो बार आंदोलन करना पड़ रहा है। होटलों में लोग नहीं बैठते। हवा में ऑक्सीजन कम, धूल ज्यादा घुले हैं। लेकिन आज तक प्रदूषण बोर्ड या सीसीएल ने यहां धूल मापने वाली यंत्र को लगाना जरूरी नहीं समझा।

केस वन - केडी ओल्ड कोयला सायडीग के निवासी अमित चौरसिया के साढ़े तीन वर्षीय पुत्र कन्हैया सांस की बीमारी से पीड़ित हो गया है। सांस फूलने पर उसे हाल ही में राजेंद्रर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (रिम्स) में भर्ती कराया गया था।

केस टू - जेहलीटांड निवासी दुलार गंझू के घर में लगे बोरिंग से पिछले 15 दिन से धुंआ निकल रहा है। आसपास का जमीन गर्म हो चुका है। उनको डर है कि जमीन के अंदर के आग की वजह से कभी भी जमीन धंस सकती है। पास की जमीन कुछ साल पहले ही धंस चुकी है। रात भर डर से नींद नहीं आती है। धुआं और धूल एक साथ पूरे परिवार को परेशान किए है।

केस थ्री - यहीं के प्रमोद लोहार की मौत पांच दिन पूर्व सांस लेने में हो रहे कठिनाई की वजह से हो गई। लोग जब तक समझ पाते उनकी मौत हो चुकी थी। ठाकुरधौड़ा के राजेश ठाकुर की दस वर्षीय बेटी की मौत भी 20 दिन पहले सांस की बीमारी के चलते हो गई है।

पांच लाख लोग हैं प्रभावित
इस प्रदूषण की चपेट में लगभग पांच लाख की आबादी है। करकट्टा से लेकर पिपरवार तक लगभग पांच लाख की आबादी है। यह पूरा इलाका प्रदूषण की चपेट में है। जो कि खदान की वजह से हर दिन बढ़ रहा है। केवल खलारी प्रखंड में 55 हजार वोटर हैं। पिपरवार चतरा जिले का हिस्सा हो जाता है।

आज तक नहीं लगी धूल मापने की मशीन 
खलारी में वायु प्रदूषण के स्तर को कभी मापा नहीं गया। यहां से 63 किमी दूर रांची की रिपोर्ट जरूर आई है। इसमें पीएम 10 का स्तर 216 एमजी प्रति घनमीटर है, पीएम 2.5 का स्तर130 बताया गया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक धूलकण जो सांस के माध्यम से गला और फेफड़ा तक जा सकता है (पीएम 2.5) की मात्रा 60 एमजी प्रति घनमीटर होनी चाहिए। वहीं जो सांस के माध्यम से नहीं जा सकता है (पीएम 10) की मात्रा 100 एमजी प्रति घनमीटर होनी चाहिए। सीसीएल की वेबसाइट के मुताबिक पिपरवार और डकरा माइंस को क्लोजर माइंस (जिसे बंद किया जाना है) के लिस्ट में डाला गया है। लेकिन प्रदूषण बोर्ड के मुताबिक वह आपत्ति शर्तों को पूरा करती है, इसलिए अभी तक चल रहा है।

दिन में छह बार करना है पानी का छिड़काव
नॉर्थ कर्णपूरा के जेनरल मैनेजर केके मिश्रा कहते हैं कि दिन में छह बार पानी का छिड़काव करने का प्रावधान है। लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है, इसमें कोई दो मत नहीं है। वह इसको दिखवा रहे हैं। ट्रकों को तिरपाल बांधकर चलाना है, लेकिन तिरपाल वाला शायद ही कोई ट्रक दिखे।


क्या है उपाय -

धूल को पूरी तरह खत्म करना नामुमकिन है। क्योंकि जब तक कोयला खदान चलेगा, ढुलाई का काम होगा और ट्रक चलेंगी ही। ऐसे में इन इलाके में रह रहे परिवारों का न्यायपूर्ण पुनर्वास ही एकमात्र समझदारी का हल है। इसके साथ ही माइंस ट्रांपोर्टिंग और पब्लिक ट्रांसपोर्टिंग के लिए अलग सड़क बनाना होगा।

ये है पुनर्वास योजना
इसके लिए सीलीएल ने आरएनआर यानी रिहैबिलिटेशन एंड रिसेटलमेंट पॉलिसी, 2012 तैयार किया है। इसके तहत जिनकी जमीन खदान में गई है अगर वह नौकरी लायक नहीं हैं तो प्रति एकड़ पांच लाख रुपए दिए जाने हैं। तीन लाख रुपए तत्काल देने हैं। इसके अलावा स्कूल, रोड, कुंआ, स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण देना होगा। विस्थापितों के लिए बने कॉलोनी में जरूरत की हर सुविधाएं होंगी। लेकिन स्थिति इसकी ठीक उलट है। कुछ लोगों को पैसा दिया गया है, कुछ को नहीं। जिनको मिल भी गया है, फिलहाल वह भी धूल के बीच ही जीवन गुजार रहे हैं। विस्थापित कॉलोनी का निर्माण चींटी की रफ्तार से चल रहा है।

चार माह पर लगता है मेडिकल कैंप -
इतनी भयंकर स्थिति के बावजूद यहां चार महीने पर मेडिकल कैंप लगता है। आसपास एकमात्र सीसीएल का डकरा में हॉस्पीटल है जहां केवल प्राथमिक इलाज होता है। सांस संबंधी बीमारी के लिए रांची आने के अलावा और कोई उपाय नहीं। खास बात तो यह कि लोगों को पता नहीं चलता कि उन्हें धूल से यह बीमारी हो रही है।
वायु प्रदूषण का मुख्य कारण
कोयला खनन, खदानों की आग, वाहनों से होनेवाला प्रदूषण, कच्ची सड़कों से हवा से उड़नेवाली धूल।

 
क्या कहते हैं अधिकारी
संजय सुमन, सदस्य सचिव, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड - ''वहां धूल मापने के लिए मशीन नहीं लगाई गई है। वहां कौन देखने जाता है। सबकी नजर रांची पर लगी रहती है, इसलिए यहां लगाई गई है।'' फिलहाल वहां ऐसी कोई मशीन लगाने की कोई योजना नहीं है। जहां तक लोगों की परेशानी की बात है विभाग इसपर नजर रख रहा है। एक बार उस साइड को बंद करने का आदेश दिया था। स्थिति में सुधार और शर्त पूरा करने के बाद फिर से चालू किया गया है। मैं भी मानता हूं कि जिस तरीके से पानी का छिड़काव होना चाहिए, वह नहीं हो रहा होगा। ट्रकों को ढ़क कर ले जाना है, सड़क पक्का करना होगा, तभी धूल से थोड़ी राहत मिल सकती है।

डॉ संजय कुमार, डॉक्टर, रिम्स - केवल मेरे पास हर दिन चार से पांच मरीज आ रहे हैं। वह कहते हैं दमा है, लेकिन जांच कराने पर निमोकोनियोसिस पता चलता है। यह बीमारी पूरी तरह धूल और प्रदूषित वायु की वजह से होता है। एक बार बीमारी होने के बाद यह ठीक नहीं हो सकता है। इसे कम किया जा सकता है। कई बार साथ में टीबी भी हो जाती है। सांस इतना फूलने लगता है कि बिना ऑक्सीजन के काम नहीं चल पाता। ऐसी बीमारियों में ब्रोकियो एम्योलर लावाज नामक टेस्ट सबसे सटीक परिणाम देता है, जो कि पूरे झारखंड में कहीं नहीं होता है।
नीतीश प्रियदर्शी, पर्यावरणविद् - दामोदर और साफी नदी बहुत प्रदूषित हो चुकी है। आर्सेनीक और लेड, क्रोमियम, निकेल, अल्पमात्रा में मरकरी वहां मौजूद है। लेड सबसे ज्यादा है। ऐसे पानी को पीने से हाई ब्लडप्रेशरस किडनी और लीवर पर असर पड़ता है। आर्सेनिक चमड़े पर बुरा असर करता है। वहां केवल कोयला निकाल के बेच देने का काम हो रहा है। वहां मैं सन 1994 से शोध कर रहा हूं, हर दिन स्थिति बिगड़ती जा रही है। यहां के लोगों की औसतन 58 - 60 साल उम्र रह गई है। हवा और पानी में किस तरह की हानीकारक चीजें हैं, इसकी ना तो जानकारी है, ना ही सीसीएल ने जागरुकता अभियान चलाया है।
क्या कहते हैं लोग
दुलार गंझू (65 साल) - हमारी जमीन पर खदान चल रहा है। सीसीएल ने नौकरी तो दे दिया है, लेकिन हम यहां रह नहीं सकते। जमीन कभी भी धंस सकती है। मुआवजा देकर कहीं और बसा दे।
शिवनाथ गंझू (40 साल) - हमको विस्थापित करके कहीं और बसा दे। पांच लोग परिवार में हैं, हर दिन दो किमी दूर से पीने का पानी लाना पड़ता है। चार बार ट्रक रोकते हैं, तब जाकर पानी छींटता है।
राम अयोध्या चौधरी (55 साल) - साफ खाना और पानी के बारे में सोचना भी बंद कर दिए हैं। सबसे अधिक चिंता बच्चा सब का लगा रहता है, पूरा भविष्य खराब हो गया है।

राष्ट्रीय डाटा
3,283 भारतीयों की जान वायु प्रदूषण की वजह से गयी हर दिन
12 लाख लोग सालभर में मरे हैं भारत में
3 प्रतिशत का नुकसान हुआ है जीडीपी को
(स्त्रोत - ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज’ 2015 - जीबीडी)
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