रांची: कभी प्लेट में जमती थी बर्फ, अब तप रहा शहर 

झारखंड में मिट्टी का बनना बंद हो चुका है. चूंकि बाढ़ वाला इलाक कभी नहीं रहा, ऐसे में यहां नई मिट्टी नहीं बन रही है. पर्यावरणविद् नीतीश प्रियदर्शी के मुताबिक झारखंड के जंगल अब अस्वस्थ दिख रहे हैं. क्योंकि जंगल से सूर्य की किरणें दिखाई देती है. यह शुभ संकेत नहीं है. राज्य में प्राकृतिक जंगल हर दिन कम हो रहे हैं. ऐसे में अगर पृथ्वी को बचाना है तो जंगल और पानी दोनों को बचाना होगा. वह कहते हैं कि 80 के दशक में जाड़े के मौसम में छत पर अगर प्लेट में पानी छोड़ देते थे, तो वह बर्फ बन जाता था. बीआईटी मेसरा में साल 2012 तक एयरकंडीशन नहीं लगाया गया था. लेकिन अब आलम यह है कि हर दिन पेड़ कट रहे हैं, एयरकंडीशन की बिक्री उसी रफ्तार में बढ़ रही है. तालाब कम हो रहे हैं, पहाड़ गायब हो रहे हैं.   

फोटो – दिवाकर प्रसाद

रांची में प्रदूषण का स्तर 

रांची में वायु प्रदूषण का स्तर मापने के लिए अलबर्ट एक्का चौक, वन भवन डोरंडा, हाईकोर्ट के पास मशीन लगाए गए हैं. जहां पीएम 2.5 का स्तर मापा जाता है. वहीं पारा बैंगनी किरण का स्तर दोपहर 1.30 बजे 10 पहुंच गया. यह छह से अधिक हो गया तो खरतनाक होता है. सन 1999 में 30 अप्रैल को सबसे अधिक गर्मी पड़ी थी. इस दिन अधिकतम तापमान 42.6 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया था. जो कि अब तक का अधिकतम तापमान है.

अप्रैल माह का तापमान 

2007 39.0

2008 39.6

2009 42.2

2010 42.4

2011 37.7

2012 40.2

2013 40.2

2014 39.2

2015 39.0

2016 42.4

2017 40.4

क्या है पेड़ काटने और लगाने का नियम 

रांची के जिला वन पदाधिकारी (डीएफओ) राजीव लोचन बक्शी के मुताबिक पेड़ लगाने के लिए कोई नियम नहीं है. लोग अगर चाहें तो मुख्यमंत्री जन वन योजना का लाभ उठा सकते हैं. इसके तहत डीएफओ को कुछ कागजात सौंपने होते हैं. पौधा लगाने के पूरे खर्च का 50 प्रतिशत सरकार वहन करती है. इसके बाद जितने पौधे बचते हैं, उसके मुताबिक सर्वाइवल खर्च सरकार देती रहती है. हां अगर कोई व्यक्ति अपने जमीन पर पेड़ काटकर घर बनाना चाहता है तो उसे पहले सीओ से एनओसी लेना होगा, इसके बाद उसे जिला वन पदाधिकारी के पास जमा कराना होगा. डीएफओ अपने स्तर से उसकी जांच करते हैं, फिर पेड़ काटने की अनुमति देते हैं.

तीन पुराने लोगों की जुबानी 

अशोक भगत, समाजसेवी – लगभग एक तिहाई जंगल काटे जा चुके हैं. कभी गांव-गांव में परंपरागत पेड़ जैसे पीपल, बरगद, जामुन, कटहल बहुत अधिक संख्या में हुआ करते थे. अब इनका आकर्षण खत्म हो रहा है. यह खतरनाक है. हमने बोरा बांध की प्रक्रिया शुरु की थी ताकि गर्मी के दिनों में खेती के लिए पानी रहे. गांव के लोग तो इस बात को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं. लेकिन शहर में हर दिन पेड़ कम हो रहे हैं. रांची के आसपास जितने तालाब, डैम हैं, उनमें फिर से जीवन देना होगा. साबरमती की तरह हरमू को बचाने का प्रयास किया जा सकता था, जो कि गंभीरता से नहीं हुआ. अब तक चीजें इतनी बर्बाद हो चुकी हैं कि इसको बचाना बहुत बड़ी चुनौती है.

इबरार अहमद, अध्यक्ष, अंजुमन इस्लामियां – मौसम में बदलाव तो हर आदमी महसूस कर रहा है. पिछले तीन सालों में तो रांची सबसे अधिक बदली है. पांच साल पहले तक दिन में गर्मी भले हो जाती थी, शाम बहुत शीतल हुआ करती थी. अब तो रात को भी उमस होती है. गर्मी के दिनों में बंगाल से एलीट क्लास के लोग आते थे. उनका अपना मकान हुआ करता था. मध्यमवर्गिय लोग भी जो नैनीताल घूमने नहीं जा सकते थे, वह भी रांची ही आते थे. मेरे मकान के बगल में शांति निवास होटल था. सस्ता था, लोग वहीं आते थे. साफ कहें तो रांची की पहचान जिस हरियाली और मौसम के लिए हुआ करती थी, वह खत्म हो चुकी है.

मेघनाद, फिल्मकार – चालीस साल पहले रांची में छोटे-छोटे डुंगरी जैसा पहाड़ी हुआ करता था। वह पूरी तरह हरा भरा था. परिणाम यह होता था कि वहां पर जब सूर्य की किरण पड़ती थी तो पहाड़ी उसे सोंख लेता था. अभी आदमी के गंजा सर जैसा हाल हो गया है. धूप इसको गर्म करता है, यही शहर को गर्म करता है. रांची अब चट्टान किंग हो गया है. दूसरा है कि आसपास छोटे तालाब थे उसमें पानी रहता था. बैठकर लोग पी लेते थे. पानी भी अब भाग चुके हैं. तालाब से होकर हवा चलती थी, वह शीतल होती थी. अब हवा भी गर्म चल रही है. तालाब को दुबारा भर दें तो फिर से माहौल बन सकता है. साल  1991 से मैं यहां स्थाई तौर पर रह रहा हूं. जहां घर लिया था उसके आगे-पीछे कोई मकान नहीं था. सन 1997 तक पंखा नहीं खरीदा था. अब तो कूलर भी पूरी तरह राहत नहीं दे पा रहा है.

पंचायतों में बन रही है जैव विविधता समिति 

झारखंड जैव विविधता पर्षद इस दिशा में काम कर रही है. वह राज्य के लगभग 4500 पंचायतों में जैव विविधता समिति बना रही है. रांची के सभी पंचायतों में बन चुकी है. समिति के सदस्य सचिव दिनेश कुमार ने बताया कि इसके लिए बायोडायवर्सिटी एक्ट बनाया गया है. पंचायतों के इस कमेटी में सात लोग होंगे. इसमें कम-से-कम दो महिला सदस्य, दो एससी-एसटी सदस्य का होना अनिवार्य है. गठन के बाद एकाउंट खोला गया है. रजिस्टर तैयार किया गया है. इसमें यह जानकारी रहेगी कि पंचायत में जानवर कितने और किस तरह के हैं, पेड़ – पौधे कितने और किस तरह के हैं? वहां के लोगों की खेती, देसी इलाज आदि की परंपरा क्या है? कमेटी को लाभदायक बनाया जाएगा। रांची के अलावा ईस्ट सिंहभूम, सिमडेगा और हजारीबाग में भी समिति बन चुकी है. बाकि जिलों में बहुत जल्द तैयार होगा.

फोटो – पर्यावरणविद् नीतीश प्रियदर्शी

47 साल से मनाया जा रहा पृथ्वी दिवस 

पृथ्वी दिवस एक वार्षिक आयोजन है, जिसे 22 अप्रैल को दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्थन प्रदर्शित करने के लिए आयोजित किया जाता है. इसकी स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप में की गई और अब इसे 192 से अधिक देशों में प्रति वर्ष मनाया जाता है.

ऑक्सीजन देनेवाले पेड़ का महत्व 

3 सिलेंडर के बराबर एक व्यक्ति हर दिन सांस लेता है

700 रुपए एक ऑक्सीजन सिलेंडर की कीमत है

2100 रुपए तीन सिलेंडर के हो गए

7,66,000 रुपए सलाना खर्च हो सकता है ऑक्सीजन लेने में

65 साल में पांच करोड़ रुपए का ऑक्सीजन इंसान लेता है

ऑक्सीजन देनेवाले पौधे समुद्री पौधे

जमीन का अधिकांश हिस्सा समुद्री होने की वजह से ये पौधे पृथ्वी को सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देते हैं। वातावरण में मौजूद 70 से 80 फीसदी ऑक्सीजन इन पौधे की ओर से ही बनाई जाती है।

पीपल – पीपल का पेड़ और पेड़ों के मुकाबले ज्यादा ऑक्सीजन देता है और दिन में 22 घंटे से भी ज्यादा समय तक ऑक्सीजन देता है।

बांस का पेड़ – यह अन्य पेड़ों के मुकाबले 30 फीसदी अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है। नीम, बरगद, तुलसी – पीपल के पेड़ की तरह नीम, बरगद और तुलसी के पेड़ भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देते हैं। नीम, बरगद, तुलसी के पेड़ एक दिन में 20 घंटों से ज्यादा समय तक ऑक्सीजन का निर्माण करते हैं।

प्रदूषित है रांची का पापानी 

रांची के पानी में आईरन, आर्सेनिक, फ्लोराइट, नाइट्रेट की मात्रा है। हाल ही में बीआईटी मेसरा की प्रो तनुश्री भट्टाचार्य ने अपने शोध में पाया कि रांची के कोकर, बरियातू, धुर्वा में सेलेनियम की मात्रा तय लिमिट से 10 गुणा अधिक बढ़ गया है।

फ्लोराइड का कुंआ में लिमिट (1 एमजी प्रति लीटर)

फ्लोराइड का बोरवेल में लिमिट (1.0 एमजी प्रति लीटर)

वास्तविक स्थिति 

नामकोम – 4.2

तुपुदाना – 2.46

ओरमांझी – 1.10

हरमू – 1.11

गांधीनगर – 1.48

नगड़ी – 1.06

नाइट्रेट का कुआं में लिमिट (45 एमजी प्रति लीटर)

बिजुपाड़ा टांगर,

चान्हो – 51.9 किंपो,

मांडर – 49.9

मांडर – 53.7

नगड़ी – 53.8

आइरन तय लिमिट 0.3 एमजी प्रति लीटर 

दीपाटोली – 19.53

खोजाटोली – 15.70

रांची कॉलेज – 29.87

हरमू – 16.50

धुर्वा – 12.20

सीमा से बाहर 

12 जिलों के पानी में फ्लोराइड (1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर लिमिट है)

11 जिलों के पानी में नाइट्रेट (45 मिलीग्राम प्रति लीटर लिमिट है)

1 जिले के पानी में आर्सेनिक (0.05 मिलीग्राम प्रति लीटर लिमिट है)

6 जिलों के पानी में आईरन (1.0 मिलीग्राम प्रति लीटर लिमिट है)

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