सेक्स को ले दिमाग से गंदगी निकलेगी तभी नजरिया बदलेगा : विद्या बालन

'बेगम जान' के मुंह से मादर..सुनना भले ही थोड़ा अटपटा लगे, लेकिन विद्या कहती है अब तो उन्हें गुस्सा निकालना आ गया है। इस फिल्म से उन्होंने वही तो सीखा है। वह कहती हैं हमारे यहां सेक्स को बहुत गंदा दर्जा दिया गया है। हालांकि वह इंसानी जरूरत है। जिसे लोग एक्नॉलेज नहीं करना चाहते हैं कि घर के अन्दर भी सेक्स होता है। आदमी औरत और पति पत्नी के बीच होता है। यह एक नार्मल सी चीज है, बेसिक ह्यूमन नीड है। उसके बेसिस पर सोसाइटी चलती है। दिमाग से इस बात को निकाल दीजिए कि वह गंदगी है। अगर ऐसा हुआ तो ही नजरिया बदलेगा लोगों का। पर सोच यह है कि आदमी को सेक्स की जरूरत है और औरत उसके सेक्स की इच्छा को पूरा करने के लिए बनी है। इन विषयों पर उनसे खुलकर हुई। बातचीत के अंश -   

बेगम जान और विद्या बालन में ज्यादा बोल्ड कौन है, सोच और कपड़ों के लिहाज से 
दोनों बेपरवाह हैं। मैं बोल्ड हूँ इसलिए बेगम जान का किरदार किया और बेगम जान बोल्ड है इसलिए मुझे इस किरदार ने प्रभावित किया। रही बात लोग मुझे और मेरे कपड़ों को लेकर क्या सोचते हैं तो मैं वही करती और पहनती हूँ जो मुझे अच्छा लगता है।

बेगम जान से पुरुषों और महिलाओं को क्या सीखना चाहिए? 
पुरुष प्रधान समाज होने की वजह से दोनो ही एक ही तरीके से सोचते हैं। दोनों को बेगम जान से यह सीखना चाहिए कि औरत के तरीके से कैसे सोचा जाता है। इस फिल्म में सीखने को बहुत है।

वेश्याओं का सबसे बड़ा दर्द क्या है? 
दरसल समाज में उनकी उपस्थिति है लेकिन उन्हें सम्मान नहीं है। हमें समझना चाहिए कि कोई चाहकर वेश्या नहीं बनची। हालात या फिर परिस्थिति उसे वहां लेकर जाती है। पर ये समझना कि वेश्या है उसका कोई सम्मान नहीं है, बिलकुल गलत है। उनका भी परिवार होता है। बच्चे हैं, जिनके फ्यूचर को लेकर वो संजीदा हैं। जिस तरह समाज में टीचर हैं, डॉक्टर है, मीडिया के लोग हैं सबके आम नागरिक की तरह अधिकार हैं, तो फिर उनके क्यूँ नहीं। सोचकर अजीब लगता है सारा काम करके, अपना बदन बेचकर महिलाएं इसी समाज में पैसे कमाती हैं और इसी समाज में उन्हें कोई पूछने वाला तक नहीं। इतना ही नहीं उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा बंटता है फिर भी ये हालत है। लोगों ने बताया की इस फिल्म का ट्रेलर आने के बाद मुम्बई के कमाठीपुरा में इस काम में शामिल महिलाओं ने उम्मीद भरी नजरों से हमारी तरफ देखा। लेकिन इस बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

क्या इसे कानूनी वैधता मिलनी चाहिए? संसद के आसपास ही जीबी रोड में यह कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। दोनों चीजें साथ कैसे चलती है?
जब कॉलेज में पढ़ती थी तो मुझे लगता था कि इसको कानूनी वैधता मिलने से समस्याएं खत्म हो जाएंगी। लेकिन जिस देश में मिला है, वहां भी वैसे ही हालात हैं। ऐसे में उनका हक दे दीजिए, वही समाधान है।

क्या यह पुरुषों की जरूरत है? 
थोड़ी चुप्पी।

वही पुरुष इसे अवैध कहता है, वही वहां जाता है, वही पुरुष कपड़ों पर नियंत्रण भी चाहता है?
पुरुष महिलाओं के शरीर को एक चीज की तरह देखते हैं। जिसपर काबू पाना चाहते हैं। दरसल सेक्स को लेकर हमारी सोच बड़ी गन्दी है इसको लेकर जबतक बदलाव नहीं होगा बहुत मुश्किल है। इसलिए जब आपके घर की कोई लड़की छोटे कपड़े पहनती है तो आपको सहन नहीं होता। क्यूंकि आपको पता है कि वही नजरिया बाहर के मर्दों का भी है। लेकिन हद तो यह है कि दूसरी औरतों को आप उसी तरह देखना चाहते हैं।

उसे तो प्लेजर वाली फील के साथ देखते हैं?
हमारे यहां सेक्स को बहुत गंदा दर्जा दिया गया है। हलाकि वह इंसानी जरूरत है। जिसे लोग अकनॉलेज नहीं करना कहते हैं कि घर के अन्दर भी सेक्स होता है। आदमी औरत और पति पत्नी के बीच होता है। यह एक नार्मल सी चीज है, बेसिक ह्यूमन नीड है। उसके बेसिस पर सोसाइटी चलती है। लेकिन सेक्स को लेकर दिमाग से गंदगी निकलेगी, तभी नजरिया बदलेगा लोगों का। पर सोच यह है कि आदमी को सेक्स की जरूरत है और औरत उसके सेक्स की इच्छा को पूरा करने के लिए बनी है।

जबकि जरूरत तो दोनो की है?
हां। वही तो मैं कह रही हूं।

आप, तापसी पन्नू, राधिका आप्टे ...यह कैसे हुआ है? 
यह बहुत अच्छी चीज है। डेढ़ महीने के अंदर छह विमेन सेंट्रिक फिल्में रिलीज होने जा रही है। लोग कहते थे मुझे कि इस तरह की फिल्में करोगी तो बहुत कम काम मिलेगा। पर अब देखिये। ऐसा होना ही था। हमारे आसपास महिलाएं अब नए - नए मकाम तय कर रही हैं। इससे लेखक प्रेरित होते हैं। एक्टिंग के लिहाज से जितना स्कोप इन फिल्मों में मिल रहा है, बाकि में नहीं मिलता है। मैंने आपसे पिछली बार भी कहा था कि मैं महिला हूं और अपनी लाइफ की प्रधान हूं। अब ऐसी फिल्में चल रही हैं। एट लीस्ट लोग पैसे लगाने को तैयार हैं।

फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद रेखा ने क्या कहा?
इस तरह की फिल्म देखने के बाद कोई कुछ बोल नहीं पाता है। रेखा ने केवल गले लगाया, वह रोने लगी। आलिया भट्ट ने कहा कि वह अभी बात नहीं कर पाएंगी। तन्वी आजमी ने कहा कि फिलहाल वह कुछ बोल नहीं सकती, बाद में फोन करेंगी। यह फिल्म आपको हिला देगी। रेखा जी ने भी तो तवायफ के रोल खूबसूरती से निभाए हैं।

तवायफ और वेश्या में तो फर्क है? 
तवायफ और वेश्या में फर्क है। तवायफ के एक या दो प्रेमी होते हैं। कुछ का तो उनके साथ लंबा रिश्ता होता था। उनपर जिद भी नहीं कर सकते थे कुछ भी करने के लिए। वह बेसिकली इंटरटेनर होती हैं। लेकिन वेश्या केवल सेक्स के लिए होती है। पार्टीशन के वक्त महिलाओं के भूमिका की चर्चा काफी कम मिलती है और वेश्याओं की तो एकदम नहीं। जबकि यह कॉंसेप्ट सदियों से है, नगरवधू के वक्त से।

लोग मुंबई में आपसे पूछते थे कि झारखंड जैसे इलाकों में शूटिंग के लिए क्यूं गई? 
कलाकार के लिए सही माहौल का मिलना जरूरी था। दुमका में जो माहौल मिला, वह बहुत ही मददगार था।

तभी तो विद्या के मुंह से आसानी से मादर... निकल जाता है? 
वाकई में उसी माहौल का असर था जो सबकुछ आसानी से हुआ। वरना पर्सनल लाइफ में मैं तो मुश्किल से इडीयट बोल पाती हूं। पहले मैं गुस्सा नहीं निकला पाती थी, अब निकाल पाती हूं।

 

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