पानी से आर्सेनिक निकालेगा मटर का छिलका

मटर का छिलका अगर आप फेक रहे हैं, तो रुक जाइए। क्योंकि यही छिलका आपके पानी से आर्सेनिक को सोख लेगा। आप स्वच्छ पानी पी पाएंगे। इस तकनीकी को विकसित किया है बीआईटी मेसरा के डॉ जयप्रकाश पांडेय, बीआईटी पॉलिटेक्निक के प्रो सतीश कुमार और रिसर्च स्कॉलर आशीष कुमार ने। जहां मटर के छिलके से ”बायोजॉर्बेंट” तैयार किया गया है। यह इतना प्रभावकारी है कि पानी से ‘आर्सेनिक 3’ के लेवल को 95 प्रतिशत तक और ‘आर्सेनिक 5’ को 85 प्रतिशत तक हटा देता है।

बायोजॉर्बेंट सोख लेता है आर्सेनिक
प्रो सतीश कुमार ने बताया कि छिलके को पहले पूरी तरह सुखाया जाता है। इसके बाद कई बार धोया जाता है। ताकि इससे हरापन और अन्य सभी तरह की गंदगी धुल जाए। इसके बाद उसे खास आकार के छोटे टुकड़ों में बदल दिया जाता है। फिर सिलेंडर के आकार वाले बर्तन से पानी को गुजारा जाता है, जहां बर्तन में रखे बायोजॉर्बेंट आर्सेनिक सोंख लेता है। इसका मतलब यह कि वह पानी में रह रहे आर्सेनिक 5 और 3 को पकड़ लेता है। डॉ सतीश ने हाल ही में इसे सीयूजे में हुए केमिकल साइंस सेमिनार में पेश किया है।

साढ़े चार साल में पूरा हुआ शोध
उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में लगभग साढ़े चार साल लग गए। अब इसे पेटेंट कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। अगर कोई कंपनी या सरकार चाहे तो इसका बेहतर से बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। झारखंड में साहेबगंज, राजहमल, उधवा जैसे इलाकों में तय मानक से कई गुणा बढ़ा हुआ है। वहीं रांची के पत्थलकुदवा में यह 20 से 50 गुणा अधिक तक पाया गया। पानी में आर्सेनिक 0.01 एमजी प्रति लीटर होना चाहिए।

प्रो सतीश कुमार के मुताबिक लोग अज्ञानतावश पानी को उबाल कर पीते हैं। यह गलत है। उबालने के बाद पानी की मात्रा तो कम हो जाती है, लेकिन उसमें आर्सेनिक उसी मात्रा में रह जाता है। ऐसे में वह पानी और जहरीला हो जाता है। इसके साथ ही इससे चर्म रोग, नंपुंसकता सहित अन्य बीमारियां हो सकती है।
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