सैलरी लगा दी, पत्नी के गहने बिक गए, तब मिला वर्ल्ड कप : हरेंद्र सिंह

साल 2005 में कप हाथ से निकल गया। अपनी कमाई का (39 लाख रुपए लगभग) को हॉकी कोचिंग के पीछे लगा दिया। खयाल नहीं रहा कि घर चलाने के लिए कब पत्नी ने खुद के गहने तक बेच डाले। मुंबई अटैक के बाद पाकिस्तान से एशिया कप मैच हारने के बाद अपने गुस्से और आंसू को रोक नहीं पाए, टीम के कोचिंग से रिजाइन कर दिया। पत्नी ने प्रॉमिस कराया, कहा फिर टीम के साथ जुड़ो, विश्प कप वापस लाओ। नहीं लाए तो हॉकी छोड़ देना। हाल ही में 18 दिसंबर 2016 को जब बतौर कोच जूनियर विश्प कप उनके हाथ में था, तब वह सही से कुछ बोल भी नहीं पाए। 

4 फरवरी 2017

बतौर कोच जूनियर टीम के साथ आपने क्या अलग किया?

मैंने अपने 18 साल का अनुभव लगाया है। शुरू से ही डायरी लिखने की आदत है। यही वजह रही कि गलतियां कम दोहराई मैंने। जो नई चीजें सीखा उसे लिखा, लागू किया। हॉकी केवल खेल नहीं, यह एक स्किल है। खेल के अलावा कई चीजों पर काम करने की जरूरत थी। जैसे मैच से पहले मूड खराब हो जाता है, क्योंकि बस टाइम पर नहीं मिली, खाना ठीक नहीं मिला, फील्ड में आते ही पब्लिक ने हूटिंग कर दी। यह सब खिलाड़ी के हाथ में नहीं है। लेकिन यह सब निगेटिविटी भर देता है। इसपर मैंने काम किया है। एक एक खिलाड़ी पर काम किया। उसके निजी और पारिवारिक जरूरतों को समझा। उसके खुशियों को साझा किया, दु:ख को कम किया।

क्या आपने अपनी पत्नी (समीक्षा) का गहना वापस किया?

नहीं। जो चीज चली गई, वह वापस नहीं आ सकती। गहना तो बहुत छोटी चीज है। मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ खोया है, लेकिन उनके त्याग की बदौलत ही मैं दुबारा हॉकी से जुड़ पाया। लेकिन सबसे बड़ा गहना 18 दिसंबर को जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप जीतने के बाद दे दिया।

कप हाथ में आने के बाद फोन पर अपनी पत्नी से क्या कहा?

यह बहुत पर्सनल सवाल है। मैंने फोन करके काट दिया। क्योंकि ना तो मैं बोल पा रहा था, ना वह। मुझे उनके रोने की आवाज आ रही थी। फिर मैसेज आया कि रात को बात करते हैं। मुझे पता था इस लम्हे के इमोशन को वह कंट्रोल नहीं कर सकती थीं। फिर मैंने सोचा कि चलो पहले इसे कंट्रोल कर लेने दो, एन्जॉय कर लेने दो, फिर बात करेंगे। कई बार खुशी के आंसू बहुत देर तक रहते हैं।

क्या आप सीनियर टीम की कोचिंग के लिए तैयार हैं?

वर्तमान कोच रोलैंड ओल्टेमॉंस 2020 तक इंडिया के कोच हैं। तब तक इसपर किसी तरह की बात ही नहीं होनी चाहिए। मेरे साथ अन्य कोच, खिलाड़ियों को ओल्टेमॉंस की मदद करनी होगी।

रिक चार्ल्सवर्थ से क्या सीखा है?

दुनिया में तीन खिलाड़ियों को मानता हूं चार्ल्सवर्थ, शाहबाद अहमद (पाकिस्तान) और धनराज पिल्लै। मॉडर्न हॉकी के ये बेताज बादशाह हैं। रिक क्रिकेटर रहे, हॉकी खिलाड़ी रहे, डॉक्टर बने, वह सबकुछ कर सकते हैं। हर बार वह हॉकी के नए रूप को वह मेरे सामने देते हैं।

धनराज पिल्लै जैसे लोग हॉकी इंडिया में बहुत बेहतर पोजिशन में क्यों नहीं है?

हॉकी इंडिया के गठन के बाद वहां डेमोक्रेसी आया। जो जिस चीज को डिजर्व करता है, उसे मिला। जिस लोढ़ा कमेटी की बात आज हो रही है, हॉकी इंडिया में पहले से ही चल रहा है।

2020 ओलंपिक की तैयारी में और क्या करने की जरूरत है?

आनेवाला विश्वकप 2018 में टॉप फोर में रहने की भारत को सोचना चाहिए। क्योंकि यहां के बाद जो जिस टीम का दिन होता है, वही जीतती है। जो खिलाड़ी इतने बड़े टूर्नामेंट में खुद को कंट्रोल कर लेते हैं, वह जीत जाते हैं। अगर यहां पहुंच जाते हैं तो समझिये ओलंपिक के किसी भी मेडल के नजदीक हैं।

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