स्वादिष्ट खाने में किरासन तेल के बूंद की तरह हैं माओवादी : बाबूलाल मरांडी, कहानी जीतन मरांडी की भाग बारह

बाबूलाल मरांडी

जीतन मरांडी, जो संस्कृतकर्मी हैं, उन्हें इतने दिनों तक जेल में रहना पड़ा। इसके लिए मैं किसी को दोष नहीं दूंगा 
इस घटना को कभी भी याद करना मेरे लिए बहुत पीड़ा देनेवाली है। मेरा बेटा मारा गया, लेकिन आज तक उसकी याद में मैंने कोई सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं किया। क्योंकि उसके अलावा कई और निर्दोष मारे गए थे। मेरे मन में सबके लिए बराबर जगह है। अगर मैं सक्षम हूं तो मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूं। जो अक्षम हैं, वह नहीं कर सकते तो इसलिए मैं खुद को उनके साथ रखकर कुछ नहीं करता। बस उसे याद करता रहता हूं। आप पूछ रहे हैं कि उस जीतन को क्यों फंसाया गया। मैंने उनके लिए आवाज क्यों नहीं उठाई या फिर इस निर्दोष जीतन के बारे में मेरे क्या खयालात हैं तो मैं यही कहूंगा कि वह निर्दोष थे। इसकी जानकारी मुझे बाद में लगी। लेकिन मैं यह कहूंगा कि यह भी उसी विचारधारा के और उन्हीं लोगों के पोषक थे। एक गोली चलाता था, दूसरा उससे सहमत था। जीतन मरांडी, जो संस्कृतकर्मी हैं, उन्हें इतने दिनों तक जेल में रहना पड़ा। इसके लिए मैं किसी को दोष नहीं दूंगा। पुलिस को उनका काम संदिग्ध लगा, पकड़ लिया। बाद में मामला न्यायालय के पास गया तो उसने फैसला लिया। बीच में उनके लिए आवाज उठाना मेरे लिए उचित नहीं था। सिस्टम दोषी है – यह पूर्ण सत्य नहीं है। पुलिस दोषी है – यह पूर्ण सत्य नहीं है। किसी भी समाज को अतिवादी की जरूरत नहीं है। अतिवादियों के लिए कोई जगह नहीं है। माओवादी किसी की सुनते नहीं हैं। मैं तो हमेशा से उनसे कहता हूं कि लड़ाई लड़नी है तो दिन में लड़ें, रात के अंधेरे में नहीं।

स्वादिष्ट खाने में किरातन तेल के बूंद की तरह हैं माओवादी 

आज लोकतंत्र है, तभी बाबूलाल मरांडी सीएम बन सका। मायावती, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रघुवर दास, नरेंद्र मोदी ने एक मुकाम हासिल किया है। ये लोग इसी को खत्म करना चाहते हैं। जैसे आप स्वादिष्ट खाना बनाते हैं, कोई उसमें किरासन तेल का एक बूंद भी डाल दे तो पूरा खाना खराब हो जाता है। ठीक उसी तरह माओवादी हैं। देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था में किरासन तेल हैं। जब मैं मुख्यमंत्री था, तब इनसे कहा था कि जहां सड़क निर्माण में गड़बड़ी हो रही है, आप उसको ठीक करने में हमारा साथ दीजिए। हम आपका साथ देंगे। बजाय इसके, इन लोगों ने भी लेवी लेना शुरू कर दिया। तर्क दिया कि यदि सरकारी अधिकारी और नेता ले रहे हैं तो वह क्यों नहीं। इसको खत्म करने के लिए गांव को विकास का केंद्र बनाना होगा ताकि वहां का सामान देश-दुनिया तक पहुंचे और देश-दुनिया का सामान वहां तक। साथ ही माओवादियों के आर्थिक और सांस्कृतिक पोषक स्रोत को भी खत्म करना होगा।

तो क्या इसके लिए ग्राम रक्षा दल और सलवा जुड़ुम जैसी व्यवस्था बनाएंगे
नहीं सलवा जुडूम तो पूरी तरह फेल हो गया। हर तरीके से यह गलत था। जब भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री मुझसे मिलते थे, मैं उनसे कहता था कि यह तो आपने लोगों को एक ही काम के लिए दो फाड़ में बांट दिया है। दोनों काम एक ही कर रहे हैं। बंद कीजिए इसको। हालांकि, झारखंड में ऐसा नहीं हुआ। ग्राम रक्षा दल सभी गांव में बनाया गया। लोग खुद आगे आए। क्योंकि सुरक्षित हर किसी को रहना था। यह बात मैं स्वीकार करता हूं कि पुलिस ने यहां भी कुछ उग्रवादी संगठन बना दिए हैं, माओवादियों से लड़ने के लिए। यह गलत है। आनेवाले समय में यह ब्लंडर मिस्टेक साबित होने वाला है।

माओवादी के तरफ से वसूली का विरोध तो गलत नहीं है न
देखिए, जब किसी बहुत भूखे को खाना मिलता है तो लगता है कि कितना खा ले। उसी वक्त कुछ और भूखे वहां पहुंच जाते हैं तो झपटमारी शुरू हो जाती है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इन भूखों को खाना ही नहीं मिलना चाहिए। कहने का मतलब है कि सुविधाएं कभी केवल कुछ परिवारों और रियासतों तक सीमित थीं। अब यदि आमलोगों के पास पहुंच रही है तो कुछ दिन झपटमारी रहेगी ही। जब मैं मुख्यमंत्री बना तो आदिवासियों के बीच 600 बसें बांट दी। उन्हें मालिक बना दिया। बोला कि पहले इनको बिगड़ने दो, इसके बाद तो वे खुद सुधर जाएंगे। क्योंकि आदिवासी अभी तक भगवान भरोसे ही रह रहे हैं। खुद को बदलने का प्रयास ही नहीं करते।

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