पत्नी अपर्णा मरांडी को भी कर दिया जेल में बंद : कहानी जीतन मरांडी की भाग ग्यारह

फांसी से रिहाई के बाद लगा दिया सीसीए, फिर एक साल के लिए जेल
इस बीच मेरे ऊपर क्राइम कंट्रोल एक्ट यानि सीसीए लगा दिया गया। वह इसलिए कि बिहार में कहीं पोस्टर चिपका दिया गया था कि जीतन मरांडी को रिहा करो, चार फांसी का बदला 14 से लेंगे, आदि आदि। इसी को पुलिस ने आधार बनाया। मतलब एक बार फिर मुझे एक साल तक जेल में ही रहना पड़ेगा। मैंने सफाई दी, सवाल किया, जेल में अच्छे व्यवहार का हवाला दिया, लेकिन कोर्ट ने नहीं सुना।

पत्नी अपर्णा मरांडी को कर लिया गिरफ्तार 

इस बीच एक दिन मेरी पत्नी अपर्णा मरांडी और बेटा आंध्रप्रदेश जाने के लिए हटिया स्टेशऩ पर थे। वे किसी कार्यक्रम के सिलसिले में वहां जा रहे थे। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया। उसे संतोषिनी नाम से गिरफ्तार किया गया था, जिसके नाम से कांडीकुंड में हुई एक नक्सली वारदात में एफआइआर दर्ज था। यहां से उसे दुमका जेल में लाकर बंद कर दिया। इसकी खबर अगले दिन अखबारों से मिली। बहुत चिंता होने लगी। बेटा चार साल का होनेवाला था। जेल में परिवार के लोग मिलने गए तो उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया। शाम को छोड़ा। हम दोनों दो जेल में।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, बाबूलाल भी जानते थे कि फंसाया गया है 
8 तारीख को। मैं अपने चार साल के बेटे को लेकर हटिया स्टेशन पर थी। शाम के लगभग छह बज रहे थे। मेरे साथ तीन और महिलाएं थी। सभी को हैदराबाद जाना था मानवाधिकार के एक कार्यक्रम में। ट्रेन आई। हम बैठ गए। तभी टीटीई आया और पूछा कि आपलोगों का टिकट कन्फर्म है क्या? मैंने कहा कि भुवनेश्वर तक तो कन्फर्म है, वहां से वेटिंग है। टीटीई के साथ कुछ महिला पुलिस सिविल ड्रेस में थीं। बोली कि चलिए नीचे, कन्फर्म करा देते हैं। थोड़ी जिद की तो हमलोग नीचे चले गए। हमें स्टेशन पर ही एक रूम में बिठाया गया। हमने बोला कि जल्दी कीजिए, ट्रेन छूट जाएगी। इस पर महिला पुलिस हमारी आईडी कार्ड और टिकट लेकर चली गई। इसके बाद लगभग 10 पुलिसवाले आ गए। अब मुझे लगा कि मामला गड़बड़ है। तब तक ट्रेन भी खुल चुकी थी। इस बीच एक महिला साथी, जो स्टेशऩ पहुंचने के रास्ते में थी, वह फोन कर रही थी। पुलिसवालों ने कहा कि उसे भी बुलाओ। क्या करती, मैंने कहा कि आओ जल्दी। हम सभी को सीआरपीएफ कैंप ले जाया गया। वहां पूछताछ होने लगी।
नाम – अपर्णा मरांडी।
दूसरा नाम – यही नाम है सर।
अरे तुम्हारा नाम तो संतोषिनी भी है, संझली भी है, मंझली भी है।
नहीं, एक ही नाम है। आप मानिये या नहीं मानिये।
टिकट किसने भेजा था – वरवरा राव ने।

मच्छर काटने से चेहरा ऐसा हो गया कि बेटा पहचान नहीं पा रहा था 

…तीन दिन तक बस यही पूछताछ होती रही। मुझे अब लग गया था कि ये लोग मुंझे भी फंसा रहे हैं। इसके बाद मुझे महिला हाजत में लाकर बंद कर दिया। यहां न तो पानी मिलता न कुछ खाने को। घर से चूरा और बिस्किट लेकर चली थी, बेटे को वही खिला रही थी। मच्छर इतना कि पूछिये मत। हाजत में एक कागज पर साइन करवाया, जिसमें मेरा नाम संतोषिनी, संझली और मंझली दिखाया गया और जगह दुमका। जबकि मैं गिरिडीह की रहनेवाली हूं, वहीं से आ रही थी। दुमका कभी गई भी नहीं थी। मैंने साइन करने से मना किया तो गाली-गलौज करने लगे। एक पुलिसवाला बोला, बच्चे का कसम खाओ कि तुम बड़े माओवादी नेताओं से नहीं मिलती हो। अरे, हमलोगों को सब पता है। जब तक मिलती नहीं होगी, पति को छुड़ाने के लिए पैसा कहां से आता होगा। जबकि वकील मेरा केस फ्री में लड़ रहे थे। काफी हुज्जत के बाद बोले जो नाम है, उसी नाम से कर दो। फिर मैंने अपर्णा मरांडी के नाम से सिग्नेचर कर दिया। यहां से रांची कोर्ट फिर दुमका कोर्ट और वहां से दुमका जेल। मैं और मेरा बेटा आलोक मरांडी। यहां बच्चा वार्ड में रख दिया गया। सात दिन तक कमरा नहीं मिला, बरामदे में ही सोती रही। मच्छर काटने से यह हाल था कि मैं और आलोक एक-दूसरे का चेहरा पहचान नहीं पा रहे थे। मच्छर काटने से पूरे चेहरे और बदन पर दाने निकल आए थे। इससे बचने के लिए बाकी महिलाएं पुरानी साड़ी को सिलकर मच्छरदानी बनाकर सोती थी। फिर एक दिन नमीता राय मिली। वह वहां पहले से बंद थी साल 2006 में हम साथ में कई कार्यक्रम कर चुके थे। उसे भी माओवादी कहकर जेल में डाल दिया गया था। उसके कहने पर जेलकर्मियों ने कमरे में एक बेड दिया। फिर नमीता ने अपनी पुरानी साड़ी दी, उसको सिलकर मच्छरदानी बनाकर सोने लगी। यहां छह महीने तक रही।

तुमपर तो सीसीए नहीं, रासुका लगना चाहिए
इस बीच रांची होटवार जेल, जहां मैं था, एसएसपी साकेत सिहं छापेमारी करने आए। जब मेरे पास से गुजर रहे थे तो जेल सुपरीटेंडेंट ने खुश होकर मेरे बारे में कहा कि सर, यही जीतन मरांडी है। वह रुक गए। बोले कि तुम नहीं सुधरोगे। सीसीए से बेहतर तो तुमपर रासुका लगना चाहिए था। यह बात मुझे चुभ गई। इस बीच एक बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपर्णा से बात करने का मौका मिला। थोड़ी हिम्मत और राहत मिली। इन सबके बीच एक साल बीत गया।

मैं जेल से बाहर, पत्नी जेल के अंदर 

28 मार्च 2013 को जेल से बाहर कदम रखा। मैं तड़प उठा। परिवार नहीं था। अपर्णा नहीं थी। बेटा नहीं था। मुझे लेने केएन पंडित, सुशांतो मुखर्जी, मोनी कच्छप, दामोदर तुरी, नरेश राम, बीपी रक्षित आए थे। रांची में प्रेस कॉन्फ्रेंस रखा गया। यहां से गांव पहुंचा तो 10 हजार से अधिक की भीड़ मेरा इंतजार कर रही थी। मैं पत्नी और बेटा को खोज रहा था। सात किलोमीटर तक जुलूस निकाला गया। अचानक परिस्थिति बदलने लगी। गांव में चापाकल लग गया। घर पहुंचने के अगले ही दिन बीडीओ मिलने आ गए। पूछा गांव में कैसा विकास चाहिए। मैंने कहा गांववालों से पूछिए। फिर मैं लग गया पत्नी को निकालने में। मई महीने में वह दोनों बाहर आए। हम गिरिडीह के रहनेवाले थे, वह दुमका जेल में बंद थी। वहां बेलर नहीं मिल रहा था। हालांकि, जज ने वकील से कहकर बेलर का इंतजाम कराया।

. निचले स्तर के पुलिसकर्मी हमेशा ऊपर वाले के दवाब में होते हैं।
. सिपाही सबसे अधिक छुट्टी के लिए परेशान रहता है।
. दारोग सच्चाई जानने के बाद भी कुछ नहीं कर पाता है।
. आम पुलिस का व्यवहार खराब नहीं होता।
. आदेश पालन करने के चक्कर में गलत काम करने पर मजबूर होते हैं।
. उच्च अधिकारी प्रमोशन की वजह से गलत उद्भेदन करते हैं।
. इसलिए केस की जांच गलत होती है।
. जेल में कोई धर्म नहीं होता।
. सबसे अधिक सामाजिकता वहीं देखने को मिली।

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