…..और हो गया चिलखारी कांड, मारे गए 19 लोग : कहानी जीतन मरांडी की भाग नौ

चिलखारी कांड के बाद मृतकों को देखने पहुंचे बाबूलाल मरांडी

सीताराम तुरी ने बताया कि वह शामिल था इस घटना में 

उसका नाम सीतारम तुरी था। उम्र लगभग 23 साल। जेल में जैसे-जैसे दोस्ती बढ़ती जाती है, लोग अपने बारे में खुलकर बताने लगते हैं। सीताराम ने पहले दूसरे लोगों को बताया कि वह इस घटना के बारे में पूरी बात जानता है क्योंकि वह खुद भी इसमें शामिल रहा है। यह बात जब मुझे पता चली तो मैं उससे बात करने को उतावला हो उठा। कैसे इससे जान पहचान बढ़ाऊं, यह सोचने लगा। उसकी गिरफ्तारी तीसरी इलाके से हुई था। तीसरी में उसका ससुराल था। पुलिस के मुखबिरों ने उसकी गिरफ्तारी कराई थी। मुखबिरों को पता था कि यह भी साजिश में शामिल था, लेकिन सीताराम ने पुलिस के सामने यह कभी स्वीकार नहीं किया। उसने बताया कि वह माओवादियों के आर्मी दस्ता में शामिल था। बाबूलाल मरांडी का भाई नूनूलाल मरांडी माओवादियों के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुका था। कई माओवादियों को गिरफ्तार करवा चुका था। उनकी हत्या करवा चुका था। वह हिट लिस्ट में आ गया था।

देखते माओवादियों ने गोली चलानी शुरू कर दी  

चिलखारी में उस दिन एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में वह आनेवाला था। इसकी पूर्व सूचना थी। योजना बनी की गांव का एक आदमी दूर से पहचान कराएगा कि कौन है नूनूलाल मरांडी, उसे उठाकर ले जाना है। मंच के सामने सभी नेता बैठ गए। सभी का ड्रेस लगभग एक जैसा। इसमें बाबूलाल मरांडी का बेटे अनूप मरांडी भी था। स्टेज के दोनों बगल से कार्बाइनधारी माओवादी दस-दस की संख्या में घुसे। एक दस्ता सामने के बैकअप के लिए तैयार था। वह छुपे हुए थे। दूर से पहचान कराने की वजह से नूनूलाल मरांडी का चेहरा किसी ने सही से पहचाना नहीं। माओवादियों में एक स्टेज पर चढ़ते ही बोला कि उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं है, बस नूनू चाहिए, लेकिन संयोगवश नूनूलाल ड्रेसिंग रूम में बैठा था। वह अतिथियों के लिए बनी जगह पर उस वक्त तक नहीं आया। देखते ही देखते माओवादियों ने गोली चलानी शुरू कर दी। इसी में अनूप मरांडी सहित कुल 19 लोग मारे गए और जिसे मारना था, वह बच निकला। मरनेवाले में कई माओवादियों के सहयोगी ग्रामीण भी थे, जिनके यहां वे लोग खाना खाते थे, सोते थे एवं सूचनाएं लेते थे। बाद में उनलोगों ने इसका दुःख भी जताया था।

अलग-अलग बैठकर रो रहे थे फांसी पाए कैदी 

इस जानकारी के बाद लगा कि पुलिस की स्टडी कितनी कमजोर है। मैं अपने वकील को इसी आधार पर टिप्स देता था कि कैसे बहस करना है, किन मुद्दों को उठाना है। मैं शाम को फिर गिरिडिह जेल पहुंच गया। यहां मेरे लिए शर्मनाक स्थित थी। जहां मैं खुले पंछी की तरह घूम रहा था, अब स्पेशल वार्ड में डाल दिया। परिचितों के बीच सेल में रहना बुरा लग रहा था। पत्नी, बच्चे और मां की बहुत याद आने लगी। डर गया। चारों लोग अलग-अलग बैठकर रो रहे थे। कोई जोर से तो कोई धीरे से। एक-दूसरे को देखकर तो और रोने लगे। चारो तरफ बस चिल्लाहट। जेल सुररिटेंडेंट की हिम्मत नहीं हुई कि वह आकर मिलें। निराश थे। अगले दिन 24 जून को गिरिडीह जेल से हमें बुलेटप्रुफ गाड़ी में हजारीबाग जेल भेज दिया गया। वहां पहुंचते ही गेट के पास ही पूरा नंगा कर दिया। बिना रस्सी वाला पायजामा दिया गया। उसे पहनते हुए इतना रोना आया कि कपड़ा भींग गया।

चारों तरफ से देख रहे थे कैदी, चिल्ला रहे थे फांसी–फांसी 

हम चारों एक साथ आगे बढ़ रहे थे। चारों तरफ से कैदी देख रहे थे। फांसी–फांसी चिल्ला रहे थे। अब मुझे एक स्लेट दिया, जिसपर मेरा नाम लिख दिया। जीतन मरांडी–मृत्युदंड। मुझे 9 नंबर वार्ड में रखा। खाना शानदार मिलने लगा। हर दिन आधा किलो दूध, स्वादिष्ट सब्जी, रोटी, चावल, इच्छा व्यक्त करने पर मीट–मछली भी। यहां बेलतू नरसंहार जो साल 2000 में हुआ था, उसमें फांसी की सजा पाए कुछ कैदी भी थे। इनको देखकर थोड़ी हिम्मत मिली। हम दिन में एक साथ रहते थे। रात को अलग कर दिया जाता था। अगले छह दिनों तक नींद नहीं आई। हम हंसी के बहाने खोजने लगे। मिल नहीं रहा था। अन्य बंदियों से बातचीत मनाही थी।

खूंखार आतंकवादी घोषित कर भेज दिया रांची जेल 

पहली मुलाकाती के रूप में पत्नी और बेटा आलोक राज मरांडी आया। वह अब तीन साल को हो गया था। जब तक पत्नी की आंख से आंसू निकलते, मैंने हंस दिया क्योंकि बाहर इनका मजबूत रहना बहुत जरूरी था। पत्नी को केस के बारे में समझाया। अगले दिन अखबारों में छपा कि हजारीबाग जेल ब्रेक कांड हो सकता है। यहां जीतन मरांडी नाम का खूंखार आतंकवादी कैद है। मुझे तुरंत रांची के होटवार जेल शिफ्ट कर दिया गया। जाने से पहले मुझे बुलाकर बोला गया कि रांची में एक मामला चल रहा है। इसलिए वहां शिफ्ट किया जा रहा है, जबकि नियम यह है कि फांसी के बाद अन्य मामले अपने आप खत्म हो जाते हैं। गौर करनेवाली बात यह थी कि केवल मुझे रांची लाया गया ताकि अन्य कैदियों को मैं राजनैतिक रूप से मजबूत न कर सकूं। उन्हें हिम्मत न दे सकूं। एक बात अच्छा हुआ कि पत्नी रांची में रहती थी। अब वह हर 15 दिन पर मिलने आ सकती थी।

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