जब तक गाते रहोगे, लिखते रहोगे, फंसाता रहूंगा : कहानी जीतन मरांडी की भाग आठ

जीतन मरांडी

जब तक गाते रहोगे, लिखते रहोगे, फंसाता रहूंगा
अगले ही दिन एसपी जेल भी पहुंच गए मिलने।
एसपी – अरे जीतन तुम्हारा तो संबंध आतंकवादी सब से है। अच्छा ये बताओ कि रोना विल्सन के इतने बड़े बाल दाढ़ी हैं, उसका खर्चा कौन देता है?
जीतन – ये आप उनसे ही क्यों नहीं पूछ लेते।
एसपी – लेख स्वीकारो, नरसंहार कबूलो।
जीतन – चुप।
एसपी – बयान बदलते हुए। पार्टी भटक गई है। चीन में खत्म हो गया, रूस में खत्म हो गया, नेपाल में हो गया, भारत में क्या खाक क्रांति होगी?
जीतन – सर, मैंने बदलाव देखा है। पार्टी क्या है, उनके लोग क्या करते हैं, कहां से हैं, मुझे मतलब नहीं। मैं जो कर रहा हूं, ठीक कर रहा हूं। …फिर वह डिबेट शुरू कर देते थे। मैं पूछता था कि जब आपको सब पता है तो हमको फंसाए क्यों हैं?
एसपी – बंदूक और आतंकवादी से नहीं डरते हैं हमलोग। तुमलोग से डरते हैं, तुमलोग हृदय बदल देते हो लोगों का। बंदूक से ज्यादा तुम लोगों के गीत लोगों का खून अधिक खौलाते हैं। जंगलवाले पार्टी से अधिक खतरनाक बाहर वाले संस्कृतकर्मी हैं।
एसपी – मुझे पता है कि चिलखारी में तुम नहीं हो, लेकिन उस पार्टी को बढ़ाने में तुम्हारा अहम रोल है। जब तक तुम गाते रहोगे, लिखते रहोगे, फंसाता रहूंगा।
जीतन – अखबार वाले से काहे नहीं पूछते हैं कि क्यों छापा?
एसपी – वह भी सोचते हैं कि हरिवंश (प्रभात खबर के संपादक) जी पर कार्रवाई कैसे हो?

फिर जेल में लिखऩा शुरू कर दिया। एसपी बिना कोर्ट के परमिशऩ के आते, मिलते, धमकाते, गाली–गलौज कर, अंत में सहानुभूति के साथ डिबेट कर चले जाते। एक बात मेरे लिए अच्छी थी कि जेल प्रशासन मददगार था। जो लिखता उसे तय पते पर जरूर भेज देता था। मैंने मानवाधिकार आयोग, कोर्ट, झालसा सभी के सामने अपना पक्ष रखा। हां, एक मुश्किल यह था कि अबकी कानूनी मदद करनेवाला जेल में कोई नहीं था। इस बीच चिलखारी हत्याकांड के अलावा मेरे ऊपर और पांच केस लाद दिया गया। एक दिन थककर मुरारी लाल मीणा से कहा कि यहां से निकाल दीजिए, लिखना, गाना, सब बंद कर देंगे। चुनाव लड़ेंगे। अचनाकर एसपी गंभीर होते हुए बोले कि चुनाव लड़ना था तो पहले बताते ना। रुको देखते हैं अब क्या हो सकता है।

गवाही के दौरान चिल्ला उठे थे जज  

इस दौरान मुरारी लाल गिहिडीह के एसपी पद से हटाए गए और स्पेशल ब्रांच आ गए। उनके हटते ही मेरे ऊपर दो केस और लाद दिया गया। डेढ़ साल जेल में हो गया था। एक दिन मुरारी लाल को पत्र लिखा। पत्र उन्हें मिल भी गया। कुछ दिन बाद दो पुलिसवाले हाजत पहुंचे। 50 आदमियों में मुझे बाहर निकाला गया। कोर्ट हाजत के गेट के बाहर लाकर खड़ा कर दिया। वहां देखा कि सात आदमी पहले से खड़े हैं। इन्हें मैं जानता नहीं था। वहां के टाउन थाना प्रभारी उपेंद्र कुमार ने उन सातों में एक को चुपके से कहा कि यही जीतन मरांडी है। इसको ही पहचानना है। मुझे पता चल गया कि इनको गवाह बनाया गया है। मुझे पहचान कराने के लिए बाहर निकाला गया है। फिर कोर्ट लाया गया। जज मो. कासिम थे। मैंने उनसे कहा कि सर मुझे बिना हस्ताक्षर के अकेले लाया गया है, जबकि नियम यह नहीं है। अचानक वह चिल्ला उठे। धमकी देने लगे। एफआईआर बनाओ। मेरा वकील आकर माफी मांगने लगा। तब जज ने अवहेलना केस नहीं बनाया। उस दिन गवाही नहीं हुई। जेल आते ही मैंने पूरी बात लिखकर गिरिडिह के जिला जज को भेजा। दो चार दिन के बाद फिर तारीख आई। उस दिन एक गवाह पक्ष में था, एक खिलाफ में। गवाही के बाद मेरा स्पेशल पेशी होने लगा। अकेले जेल से कोर्ट में लाकर पेशी करता था। स्पेशल गाड़ी, पुलिस सब मिलने लगा।

छह फर्जी गवाहों ने मेरे खिलाफ बयान दिया

कुल 6 केस चल रहे थे। हर 14 दिन पर सुनवाई के लिए बाहर आना पड़ता था। मेरे अकेले आने से गवाहों को आसानी हो गई। वह मुझे अच्छे से पहचानने लगे, लेकिन जिस इंसान की गवाही पर केस दर्ज किया गया था यानी पूरन किस्कू, जो कि बाबूलाल मरांडी के भाई नूनूलाल मरांडी का बॉडीगार्ड था और एफआइआर करनेवाला भी, वह साफ इंकार गया कि जीतन मरांडी ने गोली चलाई है। अन्य गवाहों के पास सिवाय जीतन मरांडी को पहचानने के और कोई सबूत नहीं था। फिर भी उन छह फर्जी गवाहों ने मेरे खिलाफ बयान दिया। मैंने जेल से आरटीआई किया और गवाहों का रिकॉर्ड मंगवाया। पता चला कि तीन पर कोर्ट से नॉन वेलेबल वांरट जारी है। इसमें दो पर तो नक्सली होने का केस भी दर्ज था। वारंट होते हुए भी वे कोर्ट में बयान देकर चले गए। तीनों को बॉडीगार्ड भी मिला था। अब मेरा केस मजबूत हो रहा था कि अपराधी कोर्ट में बयान कैसे दे सकता है। यह जवाब मैंने अखबारों को लिखकर भेजा। अब तक मेरा दो साल पूरा हो चुका था। इसे दैनिक जागरण ने छापा। इसमें मैंने लोगों से मदद की अपील भी की थी। वकील मेरे से पैसा नहीं लेते थे। घरवालों ने कुछ जमीन बेच दी। बाहर के लोग चंदा जमा करने लगे। जेल में भी लोग मेरे पास सलाह के लिए आने लगे। उनकी चिट्ठी लिखना, केस का अध्ययन करना, उचित सलाह देना, मेरा हर दिन का काम हो गया। बाकी कैदी मुझे बहुत बड़ा आदमी समझते थे क्योंकि अखबारों में भी छपता था।

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