हीरो हूं, हिरोइन हूं, मेरी सरकार मैं खुद हूं : विद्या बालन

झारखंड में रहकर यह सोचना कि यहां विद्या बालन से मुलाकात और बात हो सकती है। वह भी पूरी तफरी के साथ। अजूबा था मेरे लिए। ओवी वैन में आते ही विद्या ने हम सभी का नाम पूछा। मेरे साथ थे मनमोहन सिंह और अमित मिश्रा। फिर थोड़ा सकुचाते हुए पूछा कि आनंद क्या मैं पालथी मार कर बैठ सकती हूं। मैंने सोचा इससे बढ़िया कंफर्ट जोन क्या मिल सकता है, हम दोनों को। सो राजी खुशी बैठे और बातचीत शुरु हुई....

कैसा लग रहा है झारखंड में? 
यहां आसमान दिखते हैं, तारे दिखते हैं, हरियाली ही हरियाली है। मैं जहां से आई हूं, ऐसा कुछ नहीं दिखता, सिवाय बिल्डिंग के।

बेगम जान आपको मिली कैसे? 
पहली बार जब सृजीत मेरे पास आए तो उस वक्त मैं बीमार थी। मना कर दिया। बाद में हिन्दी वर्जन जब बनाने लगे तो वह फिर मेरे पास आए। मैं तैयार हो गई। बेगम जान में लोगों को दुर्गा, काली, सरस्वती, रानी पद्मावती, रंभा, मेनका सब दिखेगी।

यानी यह समाज के हर हिस्से को बदलने का माद्दा रखती है?
मैं यह नहीं कहूंगी। क्योंकि समाज को बदलने के लिए फिल्म नहीं बनाती। यह पूरी तरह मनोरंजन का माध्यम है। अगर इससे कुछ बदलता है तो वह हमारे लिए बोनस है।
कौन सी बंगाली फिल्म हाल में देखी है?
अरिंदम सील, कौशिक गांगुली की फिल्में देखी है। प्रसेनजीत चटर्जी खुद को लगातार बदल रहे हैं। बंगाली सिनेमा देश के बाकि सिनेमा को इंस्पायर करती है। विश्व स्तर के सिनेमा में भी मिडिल क्लास, लोअर क्लास की बातें होती है।

क्या आपने राजकहिनी (बेगम जान का मूल वर्जन, जो कि बांगाली में है) देखी है? 
साइन करने के बाद थोड़ा। क्योंकि देखती तो पहले वाले से खुद की तुलना करने लगती। लेकिन इसमें मैं अपनी कल्पना इस्तेमाल करना चाहती थी। बेगम जान अगल है, लेकिन राजकहिनी में रितुपर्णों ने क्या गजब का काम किया है।

विभाजन के बारे में पढ़ा, सुना, देखा है? 
इतिहास की किताबों से। हाल में उर्वसी बुटालिया की किताब दी अदर साइड ऑफ साइलेंस को पढ़ा है। पता चला कि किस हद तक लोगों की जिंदगी बदली है। फिल्मों में तमस, अर्थ देखी है।

नसीरुद्दीन शाह के साथ तीसरी दफा काम करना कैसा रहा?
पहले मैं उनसे बहुत डरती थी। इस बार मैं काफी कंफर्ट जोन में थी। उनके सामने थोड़ी सी बिंदास हो गई हूं। कैमरा के सामने वो झिझक महसूस नहीं होती।
इस फिल्म की हीरो भी आप ही?
हंसते हुए। टाइटिल रोल है। मैं हीरो हूं, हिरोइऩ हूं। मेरी सरकार मैं खुद हूं।

स्वच्छ भारत अभियान का फीडबैक लेती हैं?
इस सरकार ने कैंपेन को कोने कोने तक पहुंचा दिया है। दो साल पहले कोई बात नहीं करता था। ब्रांड एंबेसडर बनने से पहले मैं बनारस के लूसा गांव के लिए जा रही थी। रास्ते मैं शौच जाने की जरूरत पड़ी। पूरे रास्ते में कहीं ऐसी जगह नहीं मिली जहां मैं जाती। इत्तेफाक की बात है कि दो महीने के बाद जयराम रमेश का फोन आया। मुझे लगा कि यह बहुत बड़ी समस्या है। क्योंकि कभी इस समस्या को महसूस नहीं किया था। अभी इला अरुण बता रही थी कि शांति निकेतन जाने से पहले यहां बाथरूम का इस्तेमाल कर लेती हूं, क्योंकि रास्ते में कहीं शौचालय नहीं मिलता है।
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