बाबूलाल मरांडी के बेटे की हत्या में फंसा दिया गया : कहानी जीतन मरांडी की भाग तीन

चिलखारी कांड और मेरा नाम
साल 2006 में उस गीत का, जो जेल में लिखा था, उसका ऑडियो तैयार किया। नाम रखा गरीब के जिंदगानी। साल 2007 में इसी ऑडियो का वीडियो तैयार करना शुरू किया। तब तक वह ऑडियो सीडी बीबीसी के संवाददाता सलमान रावी को मिल गई। उसी समय पुलिस अधिकारी एमएस भाटिया (तत्कालीन एसएसपी, रांची) के नेतृत्व में भी भटके राही नाम से नाटक शहर में चल रहा था। बीबीसी ने दोनों को एक साथ रखकर छापा। दोनों का इंटरव्यू भी लिया। उससे मेरे बारे में लोगों की राय काफी बदली। देशभर में इसकी चर्चा हुई। इसी बीच 26 अक्टूबर 2007 को गिरिडीह के देवरी ब्लॉक के चिलखारी में पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बेटे अनूप मरांडी सहित कुल 19 लोगों की हत्या माओवादियों ने कर दी। गोली चलानेवाले में जीतन मरांडी का नाम आया। उस दिन मैं गिरिडीह के ही मधुबन में अपने वीडियो की शूटिंग में व्यस्त था। अखबारों के माध्यम से ही पता चला कि हत्या हुई है। अगले दिन प्रभात खबर में खबर छपी कि चिलखारी कांड का मुख्य आरोपी जीतन मरांडी। साथ में मेरा फोटो भी। मुझे याद है इस फोटो को एक आंदोलन के समय रांची में सुरजीत सिंह नामक पत्रकार ने खींचा था। मैंने अखबार के संपादक हरिवंश जी से बात की। अपना पक्ष रखा। उन्होंने तत्काल मेरा पक्ष छापा और उस खबर का खंडन किया। इसके बाद साल 2008 में मैंने एक लेख लिखा। झारखंड में नक्सलवाद-एक नजर।


लेख
नक्सलवाद एक नजर
चिलखारी में पिछले दिनों माओवादियों की ओर से की गई कार्रवाई में19 लोग मारे गए थे। इसके बाद हर तरफ से नक्सलवादियों एवं वर्तमान सरकार के ऊपर निशाना साधते हुए खूब प्रतिक्रियाएं आई। विपक्षी दलों ने सरकार को दोषी ठहराया तो सरकार तथा सत्ता पक्ष के लोग नक्सलवादियों को कायर कहते हुए आतंकी कार्रवाई की संज्ञा दी। इधर-उधर से प्रशासन और खूफिया को दोषी ठहराया गया। माओवादियों ने तो इस कार्रवाई को सही बताया। इसमें आठ निर्दोष मारे गए, इसके लिए खेद प्रकट किया। ग्राम रक्षा दल (इसे छत्तीसगढ़ के सलवा जुडूम के तर्ज पर ही बनाया गया था) के सरगना नुनू लाल मरांडी बच गए। गांव तीसरी और देवरी प्रखंड की जनता को शायद घटना का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि मालूम होगा। मेरी याद में राज्य अलग होने से पहले शायद ऐसी घटना नहीं हुई थी। चिलखारी में आठ निर्दोष के अलावे 11 लोगों की मौत के पीछे की ऐतिहासिक घटनाओं को गहराई से देखना होगा। इसके बाद ही थोड़ी सच्चाई का पता लग सकता है। क्योंकि ऐसी घटनाएं पहले भी हुई हैं। झारखंड राज्य अलग होने के बाद बेलतू, बेलवाघाटी और चिलखारी ही क्यों, सवाल सबके जुबां पर है। जवाब कौन देगा। नक्सली या सरकार। नक्सलवादियों ने तो बेलतू, बेलवाघाटी और चिलखारी में हुई कार्रवाई का कारण बताते हुए जिम्मेदारी भी ली है। यदि कोई भी व्यक्ति नक्सलवादियों से मारा जाता है तो वह उसकी जिम्मेदारी स्वीकारते हैं। जहां गलती से कोई मारा जाता है तो खेद प्रकट करते हुए क्षमा भी मांगते हैं। आम जनता की बात मानें तो गलत हो या सह, जहां पुलिस द्वारा कोई व्यक्ति फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाता है, वहां पुलिस स्वीकार भी नहीं करती है बल्कि मारनेवाले सिपाही एवं अफसर को पुरस्कृत किया जाता है। आज तक हजारों लोगों को पुलिस ने प्रताड़ित किया है, लेकिन कभी स्वीकार नहीं किया है। आज दिन प्रतिदिन आम जनता किसी भी कारण से क्यों न मारी जाती हो, उसके प्रति कोई जिम्मेदार क्यों नहीं है। जो भी हो नक्सलवादियों द्वारा जब कोई व्यक्ति मारा जाता है तो उसकी लंबे दिनों तक जांच पड़ताल चलती रहती है। जब पुलिस गरीब और मजलूमों को मौत की नींद सुला देती है, उसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा। क्यों उसकी जांच पड़ताल नहीं होती है? क्या हमारे देश में ऐसी जांच एजेंसी ही नहीं है?

नक्सलवादी ही हैं जो वर्तमान की सड़ी-गली व्यवस्था का खुलेआम विरोध करते हैं
दरअसल, इस पहलू पर न तो राज्य सरकार की नजर है और न केंद्र की। आज हमारे देश में केंद्र व राज्य सरकारें आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा खतरा नक्सलवाद को मानती हैऔर विकास में बाधक भी। ऐसी बातें वह लगातार कर रही है। लेकिन वह यह नहीं बोलती है कि मंहगाई, भुखमरी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, लूट, अकाल, विस्थापन, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार क्यों और कैसे जारी है? क्या यह सबकुछ ठीक है। अगर नहीं, तो क्यों इसे मिटाने का संकल्प और उचित्त कदम नहीं उठाया जा रहा है। 1947 के बाद भी क्यों ऐसे मामले आसमान छू रहे हैं। लगातार राजकीय दमन का शिकार हो रहे नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों की जनता जवाब मांग रही है। जनता का कहना है कि नक्सलवादी ही हैं जो वर्तमान की सड़ी-गली व्यवस्था का खुलेआम विरोध करते हैं और वैकल्पिक व्यवस्था बनाने के लिए संघर्षरत हैं। ऐसी घड़ी में नक्सलवाद प्रभावित इलाके में जन्मभूमि होने के चलते मैं झारखंड में नक्सलवाद एक नजर में समीक्षात्मक चिंतन प्रस्तुत कर रहा हूं।

पत्रकार भी अंधे नजर से मुझे ऐसे ही देखते हैं। तभी तो मेरे चरित्र का हनन हुआ 
आज देशभर में नक्सलवाद चर्चा का विषय बना हुआ है। यह प्रिंट मीडिया एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए उभर कर सामने आता है। इस समाचार पर जिनकी नजर रहती है, वे कभी- कभी दिग्भ्रमित तो जरूर होते हैं। क्योंकि मीडिया असलियत नहीं परोस रही है। असली बात यह है कि उन प्रभावित गांवो तक न जाकर, सुनी सुनाई बातों को ही वह ज्यादा लिख डालते हैं। ऐसे में कितनी बात सच हो सकती है, यह तो अच्छी तरह से समझ में आती है। इस भयानक चर्चा के दौर में नक्सलवाद के बारे यह एक समीक्षा है। क्योंकि मेरा गांव नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र में आता है। मैं भी कई बार नक्सली होने के आरोप में जेल जा चुका हूं। अगर उस इलाके में रहने पर ही नक्सलवादी एवं उग्रवादी का आरोप लगे तो राज्य के 18 जिले की जनता दोषी है। इसके बारे में अपनी बातों को रखना ही अगर गुनाह है तो सारा प्रचार माध्यम बंद कर दिए जाएं। साथ ही साथ पढ़ने-लिखने की भी कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि पढ़ने-लिखने से अपने चारों ओर घट रही घटनाओं की जानकारी मिलती है। जानकारी मिलने से अपनी भावनाएं किसी न किसी रूप में प्रकट होती है।

 

गिरफ्तारी और कारागार जाने से मेरी आंखे खुल गई है। मैंने नजदीक से लूट और शोषण को देखा है। कैसे निर्दोष जनता पर पुलिस झूठा आरोप लगाती है। मानव द्वारा मानव का ही शोषण कैसे होता है, इसे देखने का दर्पन कारागार होता है। मेरे ऊपर दमन तो आज भी जारी है। कुछ इने-गिने पत्रकार भी अंधे नजर से मुझे ऐसे ही देखते हैं। तभी तो मेरे चरित्र का हनन हुआ। समाज में मेरी प्रतिष्ठा को वापस कौन करेगा। मैं चिंतित तो जरूर हूं, मगर संघर्ष जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू है, समझता हूं। मैं 1994 से जनता के जीवन, की समस्याओं के साथ जुड़ा हुआ गीत गाता हूं। देश के हालात के बारे में सोचता हूं और अपनी छटपटाहटों को गीतों के जरिए प्रस्तुत करता हूं। गीतों की रचना करता हूं। हमारी गीतों में केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि उससे अंधेर जीवन बिता रहे लोगों को रोशनी प्रदान करता हूं। गीत आम जन मानस के बीच प्रेरणा का स्त्रोत बन जाता है। झारखंडी आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं को बचाए रखने हेतू लोकगीतों का प्रचार करता हूं। इसलिए मेरे द्वारा रचित गीत जनता गाती है। जारी ……

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