कहानी जीतन मरांडी की – भाग एक

जीतन मरांडी

 

नाम जीतन मरांडी
गांव – करंदो
ब्लॉक – पीरटांड़
जिला – गिरिडीह
जन्मतिथि – 21 सितंबर, 1981
पेशा – संस्कृतिकर्मी , सामाजिक कार्यकर्ता

बात सन् 1991 की है। उस वक्त मेरी उम्र 10 साल की थी। गाय, बकरी चराने के अलावा मेरा कोई काम नहीं था। एक दिन गांव में लालखंडी शब्द सुना। कुछ लोग आए थे। गीत गाते थे। कुछ संताली में और दूसरे भाषा में। बाद में पता चला कि वह हिन्दी है। मुझे सुनने में बहुत आनंद आया। दल में मेरे मामा भी थे। मैं उनके साथ गाने लगा। उसमें शोषण, गरीबी, बदहाली, अमीरी जैसे शब्द होते थे। उनके साथ एक बहुत सुंदर लड़की भी थी। काफी पढ़ी लिखी लग रही थी। मेरे गाने के तरीके से बहुत प्रभावित हुई। अपने पास बिठाकर मेरा गाना सुनती और सिखाती भी थी। उनके प्यार से मैं अभीभूत सा हो जाता। एक दिन उनलोगों ने कहा कि कलकत्ता चलो, वहां गीत गाना है।

बस मैं ट्रेन देखने के लोभ से निकल पड़ा। मां रोए जा रही थी और मैं लालखंडियों के साथ। उस वक्त तक मैं लंगोटी ही पहनता था। कलकत्ते में बहुत सारे आदिवासी मिले। सबसे छोटा होने की वजह से मेरे गलत गानों को भी लोग अधिक चाव से सुनते थे। यहां बंगाली नहीं समझ आने की वजह से खाने में पहुत परेशानी हुई। क्योंकि वह बहुत प्यार से खिलाते थे। पेट भरने पर जब देने से मना करता था तो वह समझ नहीं पाते और दे देते थे। इस समस्या से बचने के लिए थोड़ा–थोड़ा बंगाली सीख लिया। अब मैं पार्टी समझने लगा था कि यह कोई खास संगठन है, जो गरीबों को हक दिलाता है। क्यों है, कहां है, कौन चलाता है, पता नहीं था। इसका परिणाम क्या होगा, उससे मतलब भी नहीं था। क्योंकि मैं बस गीत गाता था और प्रोग्राम करता था। अब मैं हिन्दी भी समझने और थोड़ा बोलने लगा था। स्कूल की पढ़ाई छूट गई। जिस वक्त निकला था, तीसरी कक्षा का छात्र था।

अधिक सक्रिय होने की वजह से दुनिया को लेकर मेरी थोड़ी समझ हो गई थी। मेरे पास किताब आने लगा। नक्सली साहित्य। इससे नशा, शोषण, गरीबी, मजदूरी आदि समझने लगा। इस बीच मुझे हैदराबाद जाने का भी मौका मिला। ट्रेन में जितने भी मोटे आदमी को देखता था, लगता था यही शोषक है। मूंछ वाले को देखकर लगता था कि यही गरीबों को सताता है।

पहली जेल यात्रा

शौचालय के पास सुलाया, प्लास्टिक दिया शौच को 
सन् 1999 में हजारीबाग में प्रोग्राम करने गया। हम लोग गीत गा रहे थे, तभी पुलिस आकर पूछताछ करने लगी। अचानक एक ने चिल्लाकर कहा कि अरे पूछते क्या हो, पकड़ो पहले। साले नक्सली हैं। मुझे लगा कि नक्सली कोई अपराधी होते हैं। गलतफहमी में ये लोग मुझे पकड़ रहे हैं। पता चलने पर छोड़ देंगे। ट्रक में लादकर थाने ले जाया गया। जैसे ही थाना पहुंचा, मैं गीत गाने लगा। उस वक्त कुंदन कृष्णन एसपी थे। चिल्लाते हुए बोले की बंद करो ये गाना, खून खौलता है। तब मुझे लगा कि गीत में कुछ खास बात है। थोड़ा बहुत पूछताछ के बाद जेल ले जाने लगा। मैं समझ नहीं पा रहा था कि हो क्या रहा है। एक पल के लिए खुश था कि जेल देखूंगा। मजा आएगा। तभी लगा कि यहां से निकालेगा कौन। अब रोना आ गया। जेल वाली गाड़ी में मैं अपने साथियों के साथ रोने लगा। हम हजारीबाग जेल आ गए। जैसे ही अंदर गया, लगा किसी शहर में आ गए हैं। बिजली, पाइप से पानी, टंकी, सिलाई मशीन दिखने लगा। एक बार फिर मन खुश। हम सात लोग थे। सभी को आमदा वार्ड में बंद कर दिया। वहां 50 कैदी पहले से। एक खाली जगह देखकर बैठ गया। तभी एक मोटा कैदी चिल्लाते हुए गाली दिया मादर…बाप के घर में आया है क्या। उसी कमरे में पेशाब घर भी बना हुआ था। वहां जगह खाली था। मैं अपने साथियों के साथ वहीं बैठ गया। सोने को जगह नहीं थी। उस रात न तो खाना मिला, न पानी। हर दस मिनट पर कोई न कोई पेशाब करने आता। पूरा छींटा देह पर ही पड़ता। गंध अलग। लग रहा था कितने सालों से इसकी सफाई नहीं हुई है। शौच लगी। पूछने पर एक ने प्लास्टिक देते हुए कहा कि इसी में कर लो, सुबह फेंक देना। सुबह खाने में बस एक मुट्टी चूरा और रत्ती भर गुड़ मिला। डर से वह भी नहीं खा रहा था कि कहीं शौच न लग जाए। पानी नहीं पीता था, कहीं पेशाब न लग जाए।

किसी ने चिल्लाकर कहा नक्सली, देखते ही बदल गई पूरी व्यवस्था 

तीन दिन बाद हमारे बारे में अचानक हल्ला हुआ कि नक्सली आया है। वहां पहले से बंद महालाल मांझी नामक नक्सली दौड़ते हुए पहुंचे। देखते ही देखते व्यवस्था बदल गई। कपड़ा, तेल, साबुन, दातुन सब मिल गया। अब मुझे डिग्री वार्ड में डाल दिया गया। यहां चूरा के बदले बासी रोटी मिल जाती थी। इस तरह डेढ़ महीना बीत गया। बाकि साथियों को बेल मिल गई और मैं वहीं था। फिर पता चला कि मजदूर संगठऩ (मजदूर मुक्ति संघ) के लोगों ने मेरी भी बेल करवा दी है। बाहर निकला तो गर्व महसूस कर रहा था। जेल देख लिया। कुछ बातें यहां अच्छी लगी कि यहां अपराधियों से अधिक संख्या में अच्छे लोग थे। बहुत हिम्मत देते थे। यहां भी गीत गाता था, सो लोग इज्जत भी करने लगे थे। बाहर निकलने पर ही पता चला कि मुझपर रंगदारी मांगने का आरोप था, जबिक पकड़ा था भड़काऊ गीत गाने के आरोप में। इसके बाद नारी मुक्ति मोर्चा के साथ जुड़ गया। अब मेरा काम गीत गाने से अधिक अपने दल का नेतृत्व भी करना हो गया। मुझे जेल ने बच्चे से नौजवान बना दिया था।

दूसरी जेल यात्रा

बैग में रखा था तहलका मैग्जिन, समझ लिया माओवादी 
2003 में महिला दिवस के कार्यक्रम के सिलसिले में पटना पहुंचा। मुझे प्रेस रिलीज बनाने की जिम्मेदारी मिली। मैं पत्रकार नगर के एक साइबर कैफे में पहुंचा। इसक पता मुझे नारी मुक्ति संघ की ही शांति दीदी ने दी था। कैफे के मालिक सुभाष से फोन पर बात हो गई थी। शाम को वहां पहुंचने पर एक कम हाइट वाला इंसान बैठा मिला। पूरी बात बताई और मैटर देकर बैठ गया। पूछने पर बताया कि अभी अंदर में लोग हैं, थोड़ा इंतजार कीजिए। तभी काला शीशा लगा दरवाजा खुला। मुझे उस आदमी ने कहा कि जाइए। जैसे ही गेट खोलकर अंदर गया, पीछे से किसी ने पिस्तौल सटा दिया। शर्ट पकड़ा और गिरा दिया। जिसे मैं स्टाफ समझ रहा था, वहां के थाना प्रभारी विजय कुमार थे। पूछताछ की तो मैंने बताया कि रंगकर्मी हूं, गीत गाता हूं, यहां महिला दिवस के सिलसिले में आया हूं। तुरंत बैग की तलाशी लेने लगे। उसमें एक तलहका मैगजिन, महिला दिवस का पर्चा, आमंत्रण पत्र वगैरह था। वहां से मुझे गोलघर के बगल में एकता भवन लाया गया, जहां पहले से पांच नेपाली लड़के बैठे थे। पता चला कि यह नेपाली माओवादी हैं। इलाज कराने पटना आए थे, पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उस समय नेपाल सरकार की वार्ता माओवादियों से चल रही थी। मेरे सामने ही पांचों को पीटने लगे। फिर मेरे नाक पर कंघी मारकर पूछताछ करने लगे। कहां-कहां गाड़ी उड़ाया, दस्ता कौन सा है, किस बड़े नेता को जानते हो। इस बीच मेरे कानों में उन पांच नेपाली माओवादियों के चिल्लाने की आवाज आ रही थी। उन्हें बेतहाशा पीटा जा रहा था। इससे मैं काफी सहम गया। उस कंप्यूटर सेंटर का मालिक सुभाष को भी पकड़ा गया था, लेकिन पुलिस उसे कुछ नहीं कह रही थी। क्योंकि वह बिहार के मोस्ट वांडेट प्रमोद मिश्रा का बेटा था। एक सिपाही जैसे ही उसको मारने के लिए आया, एसपी विनय कुमार ने चिल्लाते हुए कहा कि अरे भोंसड़ी के बिहार में आग लगाना है क्या, इसको छूना भी मत।

पेशाब लगने से फट रहा था लिंग का नस, पर पुलिस ने नहीं खोला हथकड़ी 

अगले दिन अखबारों में छपा कि बिहार और झारखंड का एरिया कमांडर गिरफ्तार। मेरा नाम छपा था। अब तक मेरे हाथ में हथकड़ी नहीं लगाई गई थी। खबर पढ़ते ही पुलिसवालों ने हथकड़ी लगा दी। कुछ पुलिसवाले माओवादी साहित्य जैसी कुछ किताबें लेकर आए। मेरे बैग में डाल दिया, लेकिन वह कंफ्यूज थे कि कौन सा किताब सेट होगा। शाम हो गई थी। तभी पलक झपकते ही मैंने देखा कि माओवादियों में एक, जिसका नाम विनोद थापा था, बाज की तरह झपट्टा मारा। सामने एक पुलिसवाला था। उसके कमर में जो बंदूक थी, उसे छीन लिया। लेकिन वह पुलिसवाला भी काफी तेज निकला। उसकी कलाई कसकर पकड़ ली। जैसे ही कलाई पकड़ी, गोली चल गई। छह के छह गोली निकल गई। एक गोली उस सिपाही के पैर में लग गई। चारो तरफ अफरा–तफरी मच गई। इसके बाद तो उस थाने को 200 से अधिक पुलिसवालों ने घेर लिया। सभी पांच नेपाली माओवादियों की बेहरमी से पिटाई शुरू हो गई थी। एसपी विनय कुमार ने मुझसे चिल्लाते हुए कहा कि तुम इसकी बात करते थे। देखा, इसने क्या किया। इन मादर…को गोली मार देना ही ठीक है। तुरंत मेरे हाथों में भी हथकड़ी पहनाकर जमीन पर पटक दिया गया। पैर भी बांध दिए गए। इस बीच एफआइआर को फाड़ दिया गया। उन पांच माओवादियों के मुंह, कान और चेहरे से खून निकल रहे थे। सभी जमीन पर। जो भी आता, चार लात मारकर ही जाता। रातभर में कम से कम एक हजार लात तो खाए ही होंगे। पेशाब नहीं करने से मेरा नस फट रहा था। तभी डीएसपी अहमद आए। वह पहले भी आकर सहानुभूति दिखा चुके थे मेरे साथ। उनसे कहा कि सर बहुत जोर से पेशाब लगा है, हाथ खोल दीजिए। पेशाब करने के बाद भले ही बांध दीजिएगा। लेकिन वह भी बोले कि हम कुछ नहीं कर सकते। फिर कहा कि दोनों हाथ बांधे ही पेशाब करना है तो कर लो। यह संभव कैसे था। किसी तरह दोनों हाथ जो पीछे था, उसको पैर के नीचे से आगे लाया। बंदूकधारी आठ सिपाही मुझे बगल के पेड़ के पास ले गए। किसी तरह जिप खोलकर पेशाब करने लगा। आठ बंदूक मेरे ऊपर और मैं पेशाब कर रहा था। फिर रात भर उसी तरह जमीन पर फेंक दिया गया। खाना और पानी तो दूर की बात।

एक हजार पुलिसकर्मी और कोर्ट जाता मैं 

अगले दिन कोर्ट ले जाया गया। पांच नेपाली माओवादी, दो बिहार के, एक मैं और 100 पुलिसवाले। वहां हमें देखने के लिए 5000 लोगों की भीड़ जमा थी। गाड़ी से उतरते ही मैं गीत गाने लगा। चिल्लाने लगा। तभी अखबारों पर नजर पड़ी। उसमें मुझे देशद्रोही और शहर में बड़ी घटना को अंजाम देनेवाला घोषित किया गया था। जब कोर्ट से वापस लाया जा रहा था तो रास्ते में पुलिसवाले बोल रहे थे कि जीतन को फंसाया गया है। साहेब लोग अपने प्रमोशन के लिए ऐसा किया है। वे सभी इस बात से भी खुश थे कि जीतन के साथ उन सबका भी फोटो अगले दिन छपेगा अखबारों में। गाड़ी पटना बेउर जेल गेट के पास आकर रुकी। यहां गीत नहीं गाया। एक बार फिर वही माहौल। पचास लोग वाले वार्ड को तुरंत खाली कराया गया। वहां हम सभी को डाल दिया गया। हमारे पीछे सात पहरेदार। इतनी प्यास लगी थी कि पास में रखा एक डिब्बे से पानी पी लिया। रखते ही किसी ने बोला कि इससे शौच किया जाता है। तीन दिन से नहाया नहीं था, सो मन अलग घिन्न लग रहा था। पसीने की सड़ांध से पूरा देह महक रहा था। मुंह से गंध, अजीब सा महसूस हो रहा था। माओवादियों का नाम अब पता चला। विनोद थापा, अमीर तमांग, अमार कारकी – ये तीनों पहाड़ के थे। देवनाथ यादव व रोहित यादव तराई के थे और कन्हैया मिश्रा व सुभाष मिश्रा औरंगाबाद के रहनेवाले थे। जब जेल में लोगों को पता चला कि हम माओवादी हैं तो वहां पहले से कैद माओवादी भागे-भागे आए, लेकिन उन्हें हमसे मिलने नहीं दिया गया तो वे पुलिसवालों से लड़ने लगे। काफी हंगामा मच गया, लेकिन कुछ हुआ नहीं। इस बीच लगातार 15 दिन तक 24 घंटे सेल में बंद रखा गया। दो रोटी, थोड़ा चना मिलता। किसी दिन दातुन मिलता था, किसी दिन नहीं। तभी आइडिया मिला भूख हड़ताल का। धूप नहीं लगने से बीमार सा महसूस करने लगा। वहां के जेल सुपरिटेंडेंट बाल मोहन नायक झारखंड से ही थे। बातचीत हुई। लगभग डेढ़ महीना बाद एक घंटा सुबह-शाम घूमने की अनुमति मिली। अब मैं वहां गीत गाने लगा। लोग चाव से सुनने लगे। मुझे मानने भी लगे। जारी ………..

 

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