बॉलीवुड के लोग बहुत डरपोक हैं : महेश भट्ट

जख्म से राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। डैडी, अर्थ, सारांस से लोगों के दिलों में जगह बनाई। कभी मोदी के खिलाफ कैंपेन करनेवाले भट्ट आज उनकी तारीफ कर रहे हैं। वहीं शिवसेना और मनसे को लताड़ लगा रहे हैं। कहते हैं इन लोगों की हरकतों से फिल्म इंडस्ट्री को बहुत नुकसान पहुंच रहा है। लेकिन इस इंडस्ट्री के लोग बहुत डरपोक हैं। इनके खिलाफ आवाज उठाकर अपना नुकसान नहीं उठाना चाहते हैं। पेश है बातचीत के अंश…

क्या आपको सेंसर बोर्ड की जरूरत लगती है?
इसकी जरूरत तो मुझे बहुत पहले खत्म हो गई थी। यह केवल ढ़ोंग है। मेरी फिल्म को एक बार बैन किया गया था, तब मुझे लगा कि हमारी पसंद को कोई कैसे कंट्रोल कर सकता है। इनका कट और पास करने का कोई सही और फिक्स पैमाना नहीं है।

पहलाज तो संस्कारी सेंसर बोर्ड बनाने पर तुले हैं?
पहलाज पहले हमारे ही बिरादरी के थे। अब अलग हो गए हैं। पता नहीं क्यों वह ऐसा करना चाहते हैं। संस्कारी सेंसर बोर्ड का कड़ा विरोध होना चाहिए। हां श्याम बेनेगल के आने से लगता है चीजें सही हो सकती है।

दिल्ली और कोलकाता में गुलाम अली, मुंबई में क्यों नहीं?
गुलाम अली को मुंबई से भगाया गया, उस दिन हमारा सर शर्म से झुक गया। इसका जवाब केंद्र सरकार को देना होगा। उन्हीं के समर्थन वाली पार्टी ऐसा करती है। कोलकाता में ममता दीदी ने बहुत ही सराहनीय काम किया है गुलाम अली को बुलाकर।

इतना बड़ा फिल्म समुदाय राजनैतिक पार्टियों के सामने कमजोर क्यों?
फिल्मी दुनिया के अधिकतर लोग डरपोक हैं। क्योंकि फिल्मों में पैसा बहुत लगता है, कोई नहीं चाहता कि शिवसेना और मनसे के साथ उलझ कर उसे नुकसान हो। इन लोगों की हरकत से हमारे कल्चर को बहुत नुकसान पहुंच रहा है।

भारत – पाक रिश्ते में सबसे बड़ा छेद क्या है?
दोनों प्रधानमंत्री मिले तो लगा कि एक ढंठी हवा का झोंका आनेवाला है। हम सही से बैठ भी नहीं पाए, कि भूकंप सा आ गया और पठानकोट कांड हो गया। कई दफा मैं यह देख चुका हूं। हलांकि इस मामले में नरेंद्र मोदी का कदम चौंकाने वाला रहा। उस इंसान से मुझे तो ऐसी उम्मीद नहीं थी। यह सराहनीय है।

पुरस्कार वापसी का सीजन अचानक खत्म क्यों हो गया?
अनुपम खेर भी अपने हैं, आमिर खान भी अपने हैं। यही एकमात्र देश ऐसा है जहां अलग विचारों वाले लोग एक ही घर में रह सकते हैं। ‘दी लास्ट सैल्यूट’ जैसे नाटक केवल भारत में ही हो सकते हैं। पड़ोस के देश में नहीं।

आलिया भटट् को डायरेक्ट करने के लिए महेश भट्ट को और कितना इंतजार करना होगा?
आलिया ने अपने दम पर मुकाम हासिल किया है। मेरा हाथ पकड़ कर नहीं। वैसे भी वह काफी समझदार है। जिस दिन उसे लगा कि मेरे किसी स्क्रीप्ट उसे पसंद है, उसके कैरियर के लिए अच्छा है, हम काम करेंगे।

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