निःशक्त बेटी को नहीं मिला दाखिला तो खोल दिया स्कूल

बेटी निःशक्त पैदा हुई. 10 सालों तक इलाज करवाया. रांची के कई स्कूलों में दाखिले के लिए मनुहार की. सबने मना कर दिया. अंत में अपने ही घर में निःशक्त बच्चों के लिए स्कूल खोल दिया.

यह एक मां की जिद थी. अपनी जिद से गुंजन गुप्ता ने मोहल्ले में सर्वे करवाया. पता चला कि 100 से अधिक ऐसे बच्चे हैं. अभिभावकों से बात की. चार बच्चों से साल 2011 में स्कूल शुरु किया. आज 65 बच्चों का भविष्य संवार रही है. इसमें कई तो गोल्ड मेडलिस्ट हैं. रांची के पहाड़ी मंदिर के बगल में चल रहे इस स्कूल का नाम सृजन हेल्प है.

पैराओलंपिक और नेशनल गेम तक मुकाम

ज्योति टोप्पो 20 साल की है. उसने 2014 में पैराओलंपिक की 100 मीटर रेस में गोल्ड मेडल हासिल किया. वहीं रीमा कुमारी को पेंटिंग में राष्ट्रपति पुरस्कार दो बार राज्यपाल से पुरस्कार मिल चुका है. सुमन कुमारी ने नेशनल गेम में सिल्वर मेडल हासिल किया है. खुद गुंजन गुप्ता की बेटी जूही कुमारी 20 साल की है, वह भी ओलंपिक में हिस्सा लेती है.

मां बनकर संभालती है

गुंजन बताती हैं कि बच्चों को पढ़ाने के लिए आठ शिक्षक – शिक्षिकाएं हैं. इन्हें पढ़ाना बहुत मुश्किल होता है. कब क्या कर बैठें, कुछ नहीं कहा जा सकता. कोई दिन में दस बार प्रणाम करता है तो कोई जहां बैठा रहता है वहीं मल मूत्र कर देता है. सभी को मां की तरह संभालना पड़ता है. गुंजन के मुताबिक अगर ये बच्चे स्कूल नहीं आएंगे तो घर में हिंसक हो जाएंगे. खाली दिमाग खतरनाक होता है. यहां 90 प्रतिशत बच्चों के माता – पिता मजदूर हैं. ठेला, खोंमचेवाले या छोटे दुकानदार हैं.

नहीं लेती है सरकारी मदद

गुंजन गुप्ता कहती हैं कि यहां मूक – बधिर, मंद बुद्धि और शारीरिक रूप से विकलांग बच्चे हैं. शिक्षकों को बेतन देने के साथ इनपर हर माह अलग से 50 हजार रुपए खर्च होते हैं. सबको पौष्टिक भोजन दिया जाता है, कपड़े दिए जाते हैं. किताब कॉपी भी मुफ्त में दिए जाते हैं. कुछ लोग इसे अपना काम समझते हैं, वह लगातार मदद कर रहे हैं. पति की किराने की दुकान है. वह भी मदद करते हैं.

 

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