जेहाद ने तो मुस्लिम और काफिर के बीच का फर्क खत्म कर दिया है : सुशांत

सुशांत सिंह को आज लोग सावधान इंडिया के कारण घर – घर में जानने लगे हैं। लेकिन इस कलाकार ने जिस फिल्म में काम किया, खुद को भीड़ से अलग किया। किरोड़ीमल कॉलेज के इस ग्रैजुएट ने सत्या से अपना फिल्मी कैरियर शुरू किया। बेबी में अपने रोल के लिए प्रशंसा पा चुके सुशांत द डर्टी पॉलिटक्सि और लिपस्टिक वाले सपनों के साथ फिर दर्शकों को कमाल दिखाने जा रहे हैं। पेश है बातचीत के अंश… 

2 फऱवरी 2015

17 साल 45 फिल्म, क्या सही मुकाम हासिल हुआ?
मेरी जो रफ्तार है, उससे मुझे यहीं तक होना चाहिए था। कई बार लगता है कि मुझे कहीं ज्यादा मिल गया है। हर गेम में अपने नियम होते हैं। मैं अपना पीआर नहीं कर पाता हूं, ऐसे में घर बैठे जो फिल्म मिल जाती है, मेरे लिए बहुत है।

ऐसा क्यों है कि एनएसडी के लोग निगेटिव रोल करते हैं, लीड क्यों नहीं?
हम सबके चेहरे टेढ़े – मेढ़े होते हैं। हम में एक्टिंग वाली तड़प होती है। यह हीरो में नहीं मिटती। हमारे पास च्वाइस कम होते हैं। हम उस मौके के इंतजार में नहीं रह सकते कि कोई बड़ा बैनर लांच करेग। क्योंकि हमारा फिल्मी बैकग्राउंड नहीं है।

पहली कमाई क्या थी, कहां खर्चा किया
कायदे से सत्या पहली फिल्म थी। यहां मुझे 21 हजार रुपए मिले। मैं और मेरी गर्लफ्रेंड जो अब पत्नी हैं। दोनों ने मिलकर मिक्सी खरीदी। क्योंकि हमारा मन शेक पीने का मन करता था। बाद में घर में भी खर्चा किया।

लोग क्राइम देखना क्यों पसंद करते हैं?
लोगों को क्राइम देखकर सांत्वना मिलती है कि हम इससे बच गए। दूसरे की त्रासदी को देखकर सुकून मिलता है कि हम सुरक्षित हैं। हमारी लाइफ की कीमत का पता चलता है। इसलिए क्राइम, आतंकवाद को लोग ना चाहते हुए भी देखते हैं। यह मानव प्रवृत्ति है।

रांची किस सिलसिले में आए हैं
द रेड कॉरिडोर नामक फिल्म के लिए आया हूं। इसमें मेरा रोल एक नक्सली का है। मेन मुद्दा डिबेट है, कि नक्सलवाद और आदर्श अपनी जगह है। इसके बीच आम आदमी पिसता है। कहानी एक डॉक्टर और नक्सली के बीच में है। धृतमान चटर्जी ने डॉक्टर का रोल किया है। एक डॉक्टर अपनी आदर्श के लिए किसी की पहले जान बचाता है। वहीं एक नक्सलवादी अपने आदर्श के लिए पहले जान लेते हैं।

यह चक्रव्यूह से कैसे अलग है?
यह पूरी तरह अलग है। इसमें यह दिखाया गया है कि कई नक्सलियों की आत्मा मरी नहीं है। उसे जब एहसास होता है तो वह फिर मुख्य धारा में वापस आता हैं। नक्सलवाद की आइडियोलॉजी से मैं इत्तेफाक रखता हूं, तरीके से नहीं। हिंसा किसी भी बदलाव का वाहक नहीं हो सकता। उसका परिणाम भी हिंसक ही हुआ है। नक्सलवाद, फासीवाद, आतंकवाद यह सब तबाह करने वाली चीजें हैं। जेहाद ने तो मुस्लिम और काफिर के बीच का फर्क खत्म कर दिया है।

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