हम न पश्चिम का नंगापन चाहते हैं, न मध्य पूर्व का बुर्कापन : गोविन्दाचार्य

दिल्ली में निर्भया रेप कांड के बाद देश भर में महिलाओं की सुरक्षा, कामकाज, रहन - सहन, स्त्री - पुरुष संबंध को लेकर बहस ने जोर पकड़ लिया है। जो कई मायनो में सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ती दिख रही है। इन सब बातों के परिपेक्ष्य में दक्षिणपंथी खेमे की तरफ से कई विवादस्पद बयान आए। ऐसे में हमने संघ के प्रचारक रह चुके केएन गोविन्दाचार्य से बात की। स्वदेशी आन्दोलन से जुड़े गोविन्दाचार्य इस खेमे के प्रमुख विचारक भी माने जाते हैं। प्रस्तुत है बातचीत के अंश :



नारी भोग्या है या श्रद्धा ? आप क्या सोचते हैं ?
 मैं समाज को अर्द्धनारीश्वर के रूप में पूजता हूँ। जो शिव और शक्ति की युगल जोड़ी है। मैं मानता हूँ कि शिवशक्ति के रूप में समाज है। शक्ति के बिना शिव तो शव है। इसीलिए शिव अगर पुरुष है तो शक्ति प्रकृति। इस मायने में नारी का विशेष स्थान है समाज में। और यह मातृत्व के गुण के कारण है, ऐसा मैं मानता हूँ।

आए दिन होने वाली बलात्कार की घटनाओं की प्रमुख वजह आप क्या मानते हैं ?
 मनुष्य की पाशविक वृत्ति का अभव्यिक्तिकरण है बलात्कार। इसके पीछे जो दृष्टि है, वो नारी को एक स्वतंत्र, प्राणवान, स्वयं अस्तत्वि के रूप में स्वीकारने के बजाय, उसे जब पुरुष भोग्य वस्तु मानता है तब उसमे ऐसी पाशविक वृत्तियों का प्राबल्य बनता है। उसका ही परिणाम है बलात्कार। क्योंकि शारीरिक रूप से स्त्री बल के दृष्टि से कमजोर है। लेकिन सहनशीलता, धैर्य इन सब गुणों की दृष्टि से शारीरिक बलों से भी ज्यादा सबल है। जितनी यातनाएं नारी सहती हैं, पुरुष नही।

इसके अलावा और कोई कारण ?
 अगला जो महत्वपूर्ण कारण है जो हाल के सौ वर्षों में पश्चिम में और तीस वर्षों में भारत में आए कमोडिफिकेशन, कि स्त्री को वस्तु के रूप में रूपांतरित किया जाना। ये बाजारवाद का परिणाम है।

इस तरह की घटनाएँ तो तीस वर्ष पहले भी हो रही थी और अभी के कमोडिफिकेशन मानने वाली बात में कितना फर्क है ?
 दोनों में बुनियादी फर्क है। पहले तो पाशविक वृत्तियों का परिणाम था, अभी उस वृत्ति को प्रखर बनाने की बाजारवादी व्यवस्था। जिसमे अतिरक्ति गैर जम्मिेदाराना व्यवहार, अतिरक्ति अत्याचार की स्थिति में अब ये रूपांतरित होने लगी हैं।


 इस मुद्दे को लेकर संघ (आरएसएस) की दृष्टिकोण में इतना संकुचन क्यों है ?
 मुझे तो संघ का दृष्टिकोण संकुचित नहीं लगा, जितना मैंने पूरा पढ़ा। मोहनराव का भाषण आप पूरा पढ़ें उसमे समाज का एक ढंग का विश्लेषण है और उसमें पश्चमी समाज से तुलना है। हम कैसा समाज चाहते हैं इस पर बात है।

इसको जरा स्पष्ट करेंगे ?
 हम न पश्चिम का नंगापन चाहते हैं न मध्य पूर्व का बुर्कापन। तो खुलेपन और मर्यादा की भारतीय समझ है, जिसको हजारों साल भारत जी सका है। ये बात ठीक है कि मनुष्य की निम्नतम वृत्तियों का व्यव्हार में प्रतिपादन हुआ है, और ये स्वाभाविक है कि विश्वामत्रि भी इस विषय के आकर्षण से बच नही सके थे। वो सामान्य मनुष्य की वृत्ति है। केवल इतना है कि उसे संयमित करना या उसे बेलगाम छोड़ना। बेलगाम छोड़ना आज की पश्चमी आधुनिकता का कहना है। जो मनुष्य को पशु बनाने की अोर है। जिसको अंततः फ्री सेक्स का समाज माना जाए। तो ये समाज के नियमन का तरीका हो ही नही सकता।

तो क्या हो सकता है ?
 समाज के गठन का आधार रहेगा संयम और नैतिकता। अधिकार की जगह दायित्वबोध। इसको कहेंगे भारत रिश्तों से बना - बूना समाज है। पश्चिम का समाज सौदे, अनुबंध और शर्तों पर बंधा हुआ समाज है। मोहन जी की बातों को व्यापक परिपेक्ष्य में देखना समझना चाहिए कि फ्री सेक्स आधुनिकता नहीं कही जा सकती। गैर जिम्मेंदाराना व्यवहार व्यक्तिगत व्यवहार का स्थान नही ले सकता। ये समाज के विकृत्ति का लक्षण है।

लेकिन भागवत जी ने तो भारत में कम और इंडिया में ज्यादा बलात्कार होने की बात कही है। क्या ऐसे एकपक्षीय और निराधार बयान देने चाहिए ? जबकि आंकड़े इसके ठीक उलट हैं ...
 आँकड़ों का क्या कहना। उसपर तो बहुत बहस हो सकती है। भारत में थानों में एफआइआर दर्ज किए जाने को ही कितनी संभावनाए हैं ? और कहाँ, कौन थाना कितना सक्षम है ? अमेरिका में एक हजार व्यक्ति पर तेरह पुलिस है, जबकि भारत में दस हजार पर एक पुलिस। भारतीय समाज अभी भी इसीलिए बचा हुआ है कि वो पुलिसिया व्यवस्था पर बहुत निर्भर नहीं है। यहाँ अगर नारी सम्मान, आदर, आत्मीयता बची है तो इसका कारण है धर्मसत्ता और समाज सत्ता।


 यहाँ धर्मसत्ता तो नारी को उचत्ति स्थान नहीं देती है?
 जिस धर्मसत्ता से आपका अभिप्राय है, मैं उसकी बात नही कर रहा।

तो किसकी बात कर रहे हैं ?
 धर्म का आधार है नैतिकता। मैं मठ - मंदिरों की बात नही कर रहा हूँ। पण्डे - पुजारियों की बात नही कर रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ शाश्वत, सनातन, सिद्धांत। जिसे धर्म कहते हैं और जिसपर भारत चला है। अनपढ़ - गँवार, केवल भभूत रमाए और या कुछ चंद प्रवचनकार को धर्म का प्रतिनिधि मान रहे हैं तो ये आपकी नासमझी का लक्षण है।

तो किनको प्रतिनिधि माना जाए ?
 पढ़े -लिखे लोगों को। आज भी बड़े - बुजुर्गों के लिहाज, आँख की लिहाज की वजह से नारी की सुरक्षा सुनिश्चित है।

यानि कि वो सुरक्षा पुरुषों पर निर्भर होनी चाहिए ?
 नही, समाज पर।

मैं ये जानना चाहता था कि पीड़िता से सहानुभूति जताने के बजाय ऐसे बयान देना कितना उचित है ?
 जो हुआ वो बहुत ही गलत है। कोई भी उसका कैसे बचाव करेगा। बात आगे की है ..

कैलाश विजयवार्गिज ने भी उटपटांग बयान दे दिया
 बहुत से लोगों ने बयान दिया। प्रियंका चोपड़ा ने जो बयान दिए हैं उस ओर किसी का ध्यान क्यों नही गया ? उन्होंने कहा "इवेन इफ आई वॉकड नेकेड, नो बडी हैज गॉट राइट टू रेप मी" क्या कहना चाहती हैं वो ...?

ये तो उनका अधिकार होना चाहिए .....
 नंगे घूमने का अधिकार होना चाहिए ? नही, पुलिस को थाने ले जाना चाहिए। कहीं अश्लीलता का भी कानून है। क्या वो कानून तोड़ने की बात कर रही हैं ? देखिये संस्कार युक्त शिक्षा और कठोर कानून, दोनों साथ - साथ चलना चाहिए। नही तो गिरा हुआ व्यक्ति कठोर कानून से भी राह निकाल लेगा।

आशाराम बापू को क्या इस तरह के बयान देने चाहिए ?
 आज के ऐसे तनाव, उत्तेजना के माहौल में चुप रहना बेहतर था। मीडिया का भी अपना स्वभाव है कि काँट - छाँट कर दिखाना, समग्रता में नही। उसके लिए स्पेस का बहाना बनाएंगे।

तो इस बयान के लिए आशाराम नही, मीडिया जम्मिेदार है ?
 आशाराम ने देश, काल और पात्र का ध्यान नही रखा और मीडिया ने संवेदनशील माहौल को ध्यान में नही रखा।

लेकिन घटना के वक्त पीड़िता के लिए ये सलाह कि उसको भाई मान लेती तो ऐसा न होता। ये अनर्गल बयान नही है ?
 भाई - बहन का सामाजिक अंकुश और प्रेमी - प्रेमिका के सामाजिक अंकुश में गुणात्मक फर्क है। इसी बात को इंगित किया है उन्होंने। हाँ लेकिन उस लड़की की बेबसी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए। सिवाय इसके कि यह जघन्य, क्रूरतम, दंडनीय अपराध है। देश, काल, पात्र का विवेक नही रखा उन्होंने, ये सत्य बात है।



पितृ सत्तात्मक समाज को बदलना कितना आवश्यक है ?
 ये तो बहुत बड़ी सैद्धांतिक बातें हैं। इस पर मार्क्स और ऐन्जस मर चुके, कुछ नहीं हुआ। भारत में दोनों तरह की व्यवस्था है। विवाह संस्था के बारे में पूरे भारत में एक ही बात है कि यह सेक्सुअल आनंद का लाइसेंस नहीं है। यह पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वाह की संस्था भी है। भारत को भारत के नजरिये से देखें, समस्याओं को विश्लेषित करें, समाधान की ओर बढ़ें। पश्चिम के नजरिये से देखना विघटक होगा।

लेकिन ग्रामीण इलाकों में तो विवाह संस्था पूरी तरह कायम है न ?
 इसीलिए भारत बचा हुआ है। बाजार व्यवस्था का ग्राफ बढ़ते - बढ़ते अराजकता का दौर और बढ़ेगा। क्योंकि कामोन्माद और लाभोन्माद जमाना बाजार की विवशता है।

इस आन्दोलन को आप कैसे विश्लेषित करेंगे ?
 मैं मानता हूँ कि यह जनाक्रोश का विष्फोट था और यह स्वस्थ बहस को जन्म देगा।

महिला सशक्तिकरण को लेकर किन - किन स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है ?
 नैतिकता, संस्कार, शिक्षा। ये बुनियादी धरातल हैं जो हमें तैयार करना होगा और उसमें भी स्त्री शिक्षा और संस्कारयुक्त शिक्षा की ओर हमे बढ़ना पड़ेगा। हम समझते हैं कि भारत ही वह समाज है जिसमें पश्चिम का नंगापन और मध्य - पूर्व के बुर्केपन, दोनों का ठीक संतुलन साधा जा सकता है।

हमसे बात करने के लिए शुक्रिया  
 जी आपका भी ....

नोट - यह साक्षात्कार 5 दिसंबर 2012 को गोविंदाचार्य के दिल्ली के वसंतकुंज स्थित आवास पर लिया गया। 
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