हिंदी दर्शक गंभीर बहस देखना नहीं चाहते : अजीत अंजुम

अजित अंजुम देश के जाने - माने पत्रकारों में हैं। अपनी खूबियों और खामियों को खुले तौर पर स्वीकार करते हैं। अच्छे पत्रकारों की जमकर सराहना भी करते हैं। हाल - फिलहाल में मीडिया पर जिस तरह के लांछन लगाये जा रहे हैं, लोगों का विश्वास डिग रहा है, मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो रही है। ऐसे में मैनें और साथी उत्कर्ष चतुर्वेदी ने कुछ सवालों के साथ अजित अंजुम से उनके दफ्तर में बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के खास अंश


 क्या मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है ?  
 बिल्कुल चौथा स्तंभ है। इसमें तो कोई शक - सुबहा है ही नहीं। लेकिन जैसे बांकी तीन स्तंभों में कुछ खामियां पैदा हुई है, वैसे ही यहां भी हुई है। जब आदर्श स्थिति की कल्पना की गयी थी तीनों स्तंभों के लिए,  तो क्या ये तीनो स्तंभ सौ फीसदी सुचिता लिए हैं ? तीनों में सौ फीसदी पारदर्शिता है ? तीनों को जिस मानक स्थिति की परिकल्पना पर कसी गयी होगी, उस पर खड़े उतरते हैं ? नहीं। खामियां तीनों में है। तुलनात्मक रूप से न्यायपालिका इन सब में बेहतर है। समाज के हर तबके में पतन हुआ है। चौथे खम्भे को आप देखेंगे कि यह ऐसे लोगों के कन्धों पर टिका हुआ है जो तमाम तरह की खामियों से दूर होंगे, तो मुझे लगता है कि ऐसा सोचना गलत होगा।

तो क्या सोचना सही होगा ?
 कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। हां, कई बार यह मुद्दों से भटकता हुआ दिखता है, लेकिन मीडिया बहुत कुछ ऐसे काम भी करता है जो वक्त की जरुरत है। सबसे ताजा मामला फेसबुक पर कमेन्ट को लेकर जिस तरह पालघर में दो लड़कियों की गिरफ़्तारी हुई और मीडिया ने उसके खिलाफ कैम्पेन चलाया, सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा।

आप इसके दूसरे पहलु पर बात नही कर रहे हैं ?
 मैंने कहा न कि दूसरे पहलु को देखेंगे तो आप एक लाख खामियों की लिस्ट बना सकते हैं। तो सवाल उठता है कि हम केवल खामियों को देख कर सर फोड़ें या खूबियों को देखकर बेहतरी की उम्मीद करें। मैं मानता हूँ कि इस दिशा में काम होना चाहिए।

उन स्तंभों को उद्योग का दर्जा नहीं दिया गया है, जबकि इसे तो मिला है ? 
 उद्दयोग का दर्जा दिया गया है इसीलिए कि वो तीनो सरकार के पैसे से चलते हैं, लेकिन मीडिया नहीं। उन तीनों स्तंभों के संचालन में सरकार का फंड है, लेकिन जवाबदेही नहीं है। घोटाला है। सबसे बड़ी बात कि पैसा कहां से आ रहा है? मीडिया में अगर सरकार का पैसा है तो दूरदर्शन, लोकसभा और राज्यसभा टीवी आपके सामने हैं। उसको आप कह सकते हैं उद्योग का दर्जा नहीं है। लेकिन क्या वो आपके सारे पैमाने पर खड़े उतरते हैं ? काम करने का तरीका, पारदर्शिता, सरकार, सिस्टम, तमाम तरह की जो सामाजिक बुराईयां हैं उनपर चोट करना, उसपर यदि मीडिया की भूमिका देखते हैं तो क्या आपको लगता है कि सरकार के ये चैनल उस पैमाने पर खड़े उतरते हैं ? मुझे लगता है कि नहीं। मीडिया का विस्तार हुआ है। एक न्यूज़ चैनल चलता है तो उसमे 500 से 600 करोड़ की पूंजी लगती है। 150 से 200 करोड़ साल भर का रनिंग कॉस्ट होता है। जब इतना पैसा आ रहा है तो पूंजी कॉरपोरेट से ही आएगा। तो उसके कुछ खतरे भी हैं। और अगर उन खतरों पर चलते हुए कुछ बेहतरी का रास्ता नहीं अख्तियार करेंगे तो फिर बंद कर देना चाहिए।



क्या यही एकमात्र रास्ता है ? 
 क्योंकि कोई उपाय नहीं है। आप और हम चैनल शुरू नहीं कर सकते हैं। न ही ये सवाल उठाने वाले लोग 200 करोड़ का चैनल शुरू कर सकते हैं। तो फिर क्या रास्ता है? क्या सारे चैनल इन खतरों से डरकर बंद कर दें? या जो इन खतरों के बाद जो एरिया है, जहाँ बेहतर कर सकते हैं, वहां बेहतर करने की कोशिश कर सकते हैं। जाहिर है जहां पूंजी लगते हैं वहां कुछ खतरे भी होते हैं। लेकिन उन खतरों - आशंकाओं के बाद भी बहुत बड़ा दायरा है जहां कोई काम करना चाहे तो उसके लिए काम करने की गुंजाइश है। उसमे बहुत सवाल ऐसे भी उठते हैं जिससे जनता का भला होता है।

आज मीडिया जिस माहौल में काम कर रहा है या करना चाहता है, ऐसे में एथिक्स की बात करना कहां तक उचित है ?
 एथिक्स की बात तो हमेशा होनी चाहिए। अगर हम सवाल खड़े नही करेंगे, ऐसे में यदि कोई गलती कर रहा है या गलती हो रही है, तो वह सही रास्ते पर नहीं आ सकता। लेकिन मुझे लगता है कि एथक्सि की परिभाषा के बारे में सोचे जाने की जरुरत है। जब कॉरपोरेट की पूंजी लग रही है तो अगर आप सौ फीसदी सुचिता की बात करेंगे तो मुझे नहीं लगता की वह लागू हो सकता है।

यानि कि इसका कोई उपाय नही है ?
 इसका कोई उपाय नही है। उसके लिए पूंजी, कॉरपोरेट और इतना बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर में जो पैसा लग रहा है वह जिम्मेवार है। आधे भरे ग्लास में यह आप पर निर्भर करता है कि आप उसे आधा भरा हुआ कहते हैं या आधा खाली।

कार्यपालिका, विधायिका, - कभी कभी न्यायपालिका यदि गलती करती है तो मीडिया उसकी धज्जियां उड़ाने से बाज नहीं आता। मीडिया भी इसी रफ़्तार से गलतियां कर रही है। कहां जाएं लोग समाधान के लिए ? 

(पलटकर सवाल करते हुए) क्या होना चाहिए आप ही बताइए ?

उसे हर हाल में दंड मिलना चाहिए ...
 क्या पनिशमेंट। उसके लिए लीगल सिस्टम है, अदालत है, मानहानि का केस है। हर जगह मीडिया के खिलाफ केस चलते रहते हैं। सलमान खुर्शीद ने भी आज तक पर मुकदमा किया है। ऐसा तो नहीं है कि कोई किसी के खिलाफ कुछ भी छाप देगा, दिखा देगा, और उसके खिलाफ़ कार्रवाई नहीं होगी। कार्रवाई तो सिस्टम से ही होगा न। ऐसा तो नहीं होगा की संपादक को चौराहे पर लटका कर फाँसी लगा देंगे।

गलत करने वाले तो चैनल के हेड बन जाते हैं ....
 कौन ?

सुधीर चौधरी ....
 अब इस मुद्दे पर मैं कोई टिपण्णी नहीं कर सकता। उसके लिए बीइए है। बांकी फिर कानून अपना काम करेगी। हमारे टिका - टिपण्णी से कुछ होगा नहीं।



आपने कहा कि हिंदी दर्शक गंभीर बहस देखना नहीं चाहते, ऐसे कार्यक्रम को टीआरपी नहीं मिलती। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि टैम के मीटर इंग्लिश दर्शकों के घरों में ज्यादा लगे हों ?
 टैम के मीटर में बहुत बड़ी खामी है। करोड़ों दर्शकों के टेस्ट को आठ से दस हजार डब्बे कैसे तय कर सकते हैं। इसका सैम्पल साइज़ बहुत छोटा है। सरकार के पास तमाम तरह के प्रस्ताव हैं, लेकिन पता नहीं क्या करेगी। लेकिन कहीं - न - कहीं हमलोगों को यह बात जरूर खटकती है कि अच्छे कंटेंट को कई बार दर्शक नहीं देखते। रेटिंग के पैमाने पर उसको दर्शक नहीं मिलते। दर्शकों में भी मैं मैनता हूं कि एक प्रकार का हिप्पोक्रेसी है। पूछो तो कहते हैं कि द हिन्दू पढ़ता हूं, लेकिन पढ़ते दिल्ली टाइम्स हैं। बोलने और करने में फासला और फर्क है।

जब आप बड़े पत्रकारों की आलोचना करते हैं तो वे उसे किस रूप में लेते हैं ?
 मैं कहां करता हूं ?

दिलीप मंडल की कुछ दिन पहले की थी आपने ....
 वो किस रूप में लेते हैं इस बारे में मैंने कोई रिसर्च नहीं किया है। मैंने एक संपादक व्यक्ति विशेष की आलोचना की थी। क्योंकि एडिटर बनने से पहले जो बात वो कर रहे थे और बनने के बाद उनकी कथनी और करनी में फर्क दिखा। या तो संस्थान ने उन्हें मजबूर किया कि वो वही करे जो संस्थान चाहता है, या वो वह कर नही पाए जो वो करना चाहते थे। और तब फिर यह बात सब पर लागू होती है। जब तक संस्थान के एडिटर नहीं थे तब तक क्रांतिकारी थे, जब पद पर आए तो उनकी क्रांतिकारिता तथाकथित बन्धुआगिरी में बंध गई। ये मेरा विरोध है और यह मेरा व्यक्तिगत मामला है। पर मुझे नहीं लगता कि ये कोई डिबेट का विषय है। वे मेरे बड़े अच्छे मित्र हैं।

बाल ठाकरे की मृत्यु मर मीडिया कवरेज की आलोचना करने वालो को आशुतोष ने कहा की वे टीवी के नेचर को नहीं समझ पा रहे हैं। आप कितना सहमत हैं ? 
 बहुत हद तक। किसी चैनल, प्रोग्राम, टाइम स्लॉट, का अध्ययन करने की परंपरा हमारे देश में नही है। ऐसे में मीडिया की जो आलोचना है वो बहुत ही साधारण किस्म का है। उस साधारण कमेन्ट में कई बार आपके पूर्वाग्रह भी होते हैं। और यह जरूरी नही कि आपका पूर्वाग्रह देश के तमाम दर्शकों का सच हो। लेकिन अगर किसी आदमी की डेथ हुई है और उसमे बीस लाख लोग सड़क पर हैं। ऐसे में आप अपने नजरिये से बाल ठाकरे को ख़ारिज कर सकते हैं, लेकिन बीस लाख लोग सड़क पर हैं इस तथ्य को ख़ारिज नहीं कर सकते हैं। दूसरी बात, हमने क्रिटिकल कवरेज भी किया। हमने तमाम तरह के सवाल उठाए कि शिवाजी पार्क में क्यों जगह दी गई दाह - संस्कार करने को ? हमने उनके विवादित पहलू हिटलर की तारीफ, इंदिरा की तारीफ पर सवाल उठाये। जिसने चालीस साल अपने ढंग से राजनीति की उसपे तो बात होनी ही चाहिए।

अभी के युवा पत्रकार बन रहे हैं और आप जिस समय बन रहे थे, उसमें बेसिक फर्क कहां है ? 
 अभी के जेनरेशन को एक्सपोजर ज्यादा मिल रहा है। फेसबुक, ट्विटर, ऑरकुट, ब्लॉग और ये गूगल ग्रैंडफादर तो हैं ही।

मैं क्वालिटी की बात कर रहा था ....
 मैं उसी पर आ रहा हूं। दोनों में फर्क ये है कि आज मीडिया करियर ऑप्शन है। बीस साल पहले नही था, ना मीडिया का विस्तार था। आज बहुत सारे मीडिया संस्थान हैं, कुछ अच्छे भी हैं। जिनमें मैं मानता हूं कि आईआईएमसी वन ऑफ द बेस्ट संस्थान है देश का। बेसिक फर्क ये है कि पहले ये पता नहीं होता था कि हम किस रास्ते जाएंगे। पहले घर में लोग विरोध करते थे। लोग कहते थे पत्रकारिता करते हैं, ठीक है। ये बताओ कि करते क्या हो । लोग इसे रोजगार के लायक ही नहीं समझते थे। अब ऐसा नहीं है। नए लोगों में कुछ अच्छे हैं तो कुछ में जल्दबाजी है, जिसे मैं ठीक नहीं मानता हूं।

बहुत - बहुत शुक्रिया कि आपने बात किया ...
 मुझे अभी बहुत अच्छा लगा। तुम्हें देख कर मेरे अपने जवानी के दिन याद आ गये।
 दोनों हसने लगते हैं ......
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